STORYMIRROR

Shravani Balasaheb Sul

Fantasy

4  

Shravani Balasaheb Sul

Fantasy

परछाई

परछाई

1 min
391

जब खुदकी परछाई देखी

तो लगा कि सपनों की दुहाई देखी


कदम दर कदम बढ़ती रही जो

खुद के भीतर एक नामुमकिन सी जुदाई देखी


न जानें कितनी बार देखी

एक आकृति में सुकून की छाया आरपार देखी


इस चित्र की भले कोई विज्ञानकथा

फिर भी उसमें एहसासों की मारामार देखी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Fantasy