STORYMIRROR

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Classics Fantasy

4  

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Classics Fantasy

नदी का किनारा

नदी का किनारा

1 min
268

वो खुशनुमा सी शाम 

वो चांद की सरगोशियां 

वो झुका झुका सा आसमां 

और वो नदी का किनारा 

वो तेरा उड़ता आंचल 


गालों पे पड़ते तेरे डिंपल 

वो लरजती सी गोरी बांहें

छन छन करती तेरी पायल 

वो तेरी बिंदिया का सितारा 

वो तेरी लौंग का लश्कारा 


जुल्फों से टपकती नन्ही सी बूंदें 

तेरी आंखों में डूबा ये जहां सारा 

वो गुलाब से होठों की छुअन 

वो कदली सा चिकना बदन 

वो सांसों से छलकती तड़पन 


वो जीवन सा तेरा आलिंगन  

वो तेरा दबे पांव आना 

चुपके से आंखों पर हाथ रखना 

फिर उन्मुक्त हंसी हंसना 

और बात बात पर खिलखिलाना 


आईने की तरह दिखता चेहरा 

तेरी आंखों की वो गुस्ताखियां 

वो कातिल सी एक मुस्कान 

मुझे सब कुछ याद है, मेरी जान 

तू नहीं है आज, पर तेरी याद तो है 

लबों पे तेरे आने की एक फरियाद तो है 

मेरे दिल की पुकार ना सुन, कोई बात नहीं 

तुझे पुकारता वो नदी का किनारा तो है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance