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संजय असवाल "नूतन"

Tragedy Inspirational Others

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संजय असवाल "नूतन"

Tragedy Inspirational Others

पलायन का दर्द..

पलायन का दर्द..

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वो गांव था कभी, 

अब वीरान पड़ा है,

बंजर खेतों का बस एक नाम बचा है,

सूखी नदियां सिसकती, 

यहां जंगल भी रोते हैं,

बिखरे रिश्तों की अब 

बस यादें होती हैं।

पलायन की राह

दिल को छलनी करती है,

ख्वाबों की जमीं, 

धरती को बंजर करती हैं,

मां की आंखों में 

बस आंसू रह गए,

पिता भी तरसे

बाहें उनकी सूनी कर गए ।

दरकते पहाड़,उजड़े गांव

ये ज़ख्म बहुत गहरे हैं,

सूने आंगन में

ये खंडहर बहुत खड़े हैं,

बचपन की गलियां 

अब सुनसान पड़ी है,

सपनों की राहें भी 

अनजान अड़ी हैं।

क्या लौटेगा कोई.....!

क्या ये मुमकिन है अब?

खेतों में हरियाली आएगी कब?

नदियां क्या गाएंगी, 

कब कल कल सुनाएंगी,

पंछी भी लौटकर क्या

घोंसलों में आयेंगे?

ये कहानी बस

क्या कहानी रह जाएगी?

राहों में चलकर 

क्या उन्हीं में खो जाएगी।

सुन सको तो सुनो,

ये सिसकती धड़कनें,

रूह गांव की रोकर अब क्या कह रही है,

बताओ तुम क्या लौट कर आओगे?

ये धरती तुम्हारी, 

ये मिट्टी तुम्हारी,

संभालो इसे......!

ये है जिम्मेदारी तुम्हारी।


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