पिता
पिता
पिता
अगर माँ का ममता-भरा आँचल है विशाल सागर,
तो जीवन के हर तूफ़ान में पिता बनते हैं अडिग पहरेदार।
जब तक संतान पर रहता है पिता का साया,
हर कठिनाई में वह खड़ा होता है चट्टान-सा हिम्मत दिलाया।
छोटी-मोटी दिक़्क़तों में याद आती है माँ की ममता,
पर जब अचानक पिता का होता है निधन,
पाँव तले की ज़मीन खिसक जाती है,
और हर पल याद आते हैं उनके किए अनगिनत एहसान।
जब तक पिता के शरीर में होती है जान,
उनके कर्मों की पहचान संतान नहीं कर पाती।
माँ की तरह ही पिता भी करता संतानों से प्यार,
दायित्व को निभाता जब तक नहीं मिलती अंत हार।
बस उस में होती हैं एकही कमी जीवनभर,
जो नहीं जता हर पल सकता माता जैसा प्यार।
प्यार जताने का पिता का दिल भी करता हरबार,
लेकिन संतानोंके भविष्य का रखता खयाल बार -बार।
