बेदिल रिश्तों की पीड़ा
बेदिल रिश्तों की पीड़ा
बेदिल रिश्तों की पीड़ा
बिना वजह जो अपने पीड़ा दे,
उसे कैसे भला पराई पीड़ा कहे।
निभाते सभी दिखावटी रिश्ते,
लेकिन उनके अंतस के भेद गहराते।
करते हमेशा सबके तारीफ सामने,
लेकिन रचते सदा झूठे नापाक इरादे।
ऐसे बेदिल रिश्ते मुझे क्यूँ मिले,
इससे तो बहत्तर हैं धरती की जुदाई।
मैं फिर भी निभाता मानवता का रिश्ता,
आज नहीं तो कल बनेगा दिल का नाता।
इसी उम्मीद में जीवन का हर पल जीता,
क्या मैं सँभाल सकूँगा अनमोल मानवता?
दिल और दिमाग को एक ही प्रश्न सताता,
ईश्वर ने मुझे किस कर्म हेतु धरती पर भेजा।
यदि मनुष्य मनुष्य से प्रेम न निभाता,
तो कैसे जीवित रहेगी धरती पर मानवता?
अगर मैं मानवी प्रेम का रिश्ता न निभाऊँ,
तो यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी असफलता।
फिर यहाँ आने का कोई कारण न रह जाता,
और मेरे अस्तित्व की कोई उपयोगिता न बनती।
