ज़िंदगी दुबारा
ज़िंदगी दुबारा
ज़िंदगी दुबारा
मेरी जवानी की दहलीज़ पर,
मैं था इश्क़ का खिलाड़ी, मगर अनाड़ी।
तुम्हारी नशीली नज़रों के तीरों ने,
मुझे याद दिलाई अपनी जवानी।
तुम्हारी हिरनी-सी मस्त चाल,
हर पल मुझे मदहोश कर जाती।
मैं बेनाम इश्क़ का आवारा मुसाफ़िर,
अपनी मंज़िल छोड़कर तुम्हें मंज़िल बना बैठा।
तुम्हारी अदाओं का चलता जादू,
दिल और दिमाग पर इश्क़ की चाबुक चला गया।
तुम्हारे अदृश्य दिल की लहरें,
हर पल मुझे निरंतर उत्तेजित करती रहीं।
जब भी हमारी नज़रें टकरातीं,
तुम हमेशा मुझे घायल कर देतीं।
मेरे प्यासे दिल की आग बुझाने में,
तुम मेरा साथ क्यों नहीं देतीं?
ज़िंदगी में इश्क़ इतना सुहावना लगा,
कि जान से भी प्यारा हो गया।
तुम्हें मंज़िल बनाने की दौड़ में,
मैं अपना ही वजूद खो बैठा।
क्या तुम्हें जीवन साथी बनाकर,
हमारी ज़िंदगी का सफ़र पूरा होगा?
क्या तुम्हें पाने का मेरा सपना सच होगा,
या मुझे ज़िंदगी फिर से जीनी पड़ेगी—दुबारा?

