मेरा गाँव.
मेरा गाँव.
मेरा गाँव.
वर्धानदी किनारेपर बसा है मेरा गाँव,
वही है मेरा प्यारा-नारा जन्मगाँव।
उसी मृदा मैं बड़ा-पढ़ा-पला और बना युवा,
बच्चपन के यादों से जुड़ा वह मेरा गाँव।
वर्धानदी के किनारों पर अनेक पावन तीर्थस्थान,
पुलगाँव,कौडण्यपूर,कोठेश्र्वर सभी पावन यात्रास्थान।
सूबेके सभी तीर्थयात्रियों के आस्थाके वे पावनस्थान,
सभी स्थानोंपर मेला तीर्थयात्रियों के लिए आकर्षण।
उपनदी धाम व अन्य उपनदीयोंका उसमें विलयन,
धामनदी है पवानार में भूदानयोगी का कर्मस्थान।
विनोबा भावे सर्वोदय साहित्य का वहां पावन दालान,
नदीपार सेवाग्राम, गाँधी के आझादी का केंद्रस्थान।
ऐसे पावन नदी किनारे मेरा प्यारा-नारा गाँव,
इसी गाँव में निकलती पावन नदीकी पंचधाराएं।
नदी की लुभावन तेज धाराएं कुंड में आके गिरती,
उसे देखकर सभी तीर्थयात्री होते हैरान और मोहित।
वर्षाऋतु में जब-जब नदी उफान पर बहती,
उसी समय कुंड और पंचधाराएं लुप्त हो जाती।
कुंड इन धाराओं से अन्य ऋतु में उमड़ता नहीं,
इसी कारण यह यात्रीयों की पुण्य ऐतिहासिक भूमि।
वहां का कपड़ा था कभी राजस्थानी परिधान,
वहां है देश के गोलाबारूद का मुख्य भंडारण।
नदीपर बने बड़े रेल्वेपुल से पुलगांव की पहचान,
मुंबई-हावड़ा प्रमुख रेलमार्ग यातायात का साधन।
वही पावन बहुचर्चित स्थान मेरी जन्मस्थली,
गाँव की मिट्टी की खुशबु मुझे सदा पुकारती।
उसे गाँवमें मुझे निरंतर सुकुन व शांती मिलती,
वर्धानदीवाला जन्मगांव मेरे लिए सदा मनमोहिनी।
