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Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

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Chandresh Kumar Chhatlani

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एक गीत

एक गीत

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इस ज़िंदगी के किस पल में 

जाने कब क्या हो जाये।

मिल कर सारे जहाँ की ख़ुशी,

ज़िंदगी ही खो जाये।


खुशियों के दर्पण के पीछे,

हम दीवाने हो जाते हैं।

दीवानगी में ये ना सोचे,

अक्स ही हमें सुहाते हैं।

सुख के हर इक अक्षर को, दुःख जाने कब धो जाये।


खुशी तो इक आज़ाद पंछी,

पिंजरे में न रह पायेगा।

दिल का सूना पिंजरा भरने,

दुःख ही फिर से आ जाएगा।

जाने कब गम का आंसू, दामन को भिगो जाये।


गुल नहीं सब बहार में,

कुछ कांटे भी खिलते हैं।

हर सुख के दिवास्वप्न में,

दुःख के बादल भी मिलते हैं।

कौन जाने कब ये सुख, अपने सपनों में सो जाये।


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