STORYMIRROR

Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

4  

Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

बस यूं ही

बस यूं ही

1 min
375

बस यूं ही एक पिता 

अपने बच्चों की तस्वीर ले के

बहल जाता है...


बस यूं ही एक पिता

उनकी गलती पे डांट के

खुद नहीं रोता...


बस यूं ही एक पिता

इंतजार नहीं करता

खुद के किसी दिवस का...


बस यूं ही एक पिता

अपनी मनपसन्द आइसक्रीम

कभी नहीं खाता...


बस यूं ही एक पिता

हँसता है शाम को बच्चों के साथ

दिन भर की दुर्दशा के बाद भी....


बस यूं ही एक पिता

शहर के बाहर जाकर भी 

कहीं घूमता-फिरता नहीं अकेले....


बस यूं ही एक पिता

कमतर रहकर भी तुलना नहीं करता

पितृत्व की माँ की ममता के साथ...


बस यूं ही एक पिता

लड़ लेता है अकेले पूरी दुनिया से

कई बार हो जाता है अकेला घर पे भी...


बस यूं ही एक पिता

पी लेता है शराब की आधी बोतल

अपने अकेलेपन से बोर होकर


बस यूं ही एक पिता

कहता नहीं कभी अपने मन की बात

कमजोर साबित नहीं होना चाहता


बस यूं ही एक पिता

पिसता है बहुत सी चक्कियों के बीच

खुद को बेहतर बनाने के लिए


बस यूं ही एक पिता

पता नहीं क्या-क्या कर गुजरता है

यह कहते हुए "बस यूं ही..."



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract