दया भाव धर्म महान
दया भाव धर्म महान
सब धर्मों का मूल दया, ज्ञान से बढ़ यह गुण,
दया रखिए मन में, ह्रदय बसे सद्गुण।।
नेत्रहीन, बधीर भी समझ जाए, दयालुता ऐसी भाषा,
जन्म ये सफल है, गर दूर कर सकें किसी की निराशा।।
दर्द देखकर किसी का,आंँखें फेरना, है इंसानियत धर्म नहीं,
ये जग हो जाए रेगिस्तान गर दयालुता की हो भावना नहीं।।
सिंधु सा विस्तृत ह्रदय जिसका, सब जीवो पर दया रखे,
दया विद्यमान नहीं जिसके हृदय, वो तो पशु समान होवे।।
दया कोई दिखावा नहीं हृदय का सच्चा भाव इसमें निहित,
जग प्रशंसा हेतु करे दया, है यह स्वार्थ देखे केवल स्वहित।।
चंद सिक्के, थोड़ा अनाज देकर, अपनी फोटो खिंचवाना,
दया भाव नहीं ये, है गरीबों की बेबसी का मज़ाक उड़ाना।।
एहसास कहांँ है दर्द का मदद के नाम पर फोटो खिंचवाते,
ऐसे ही लोग बेबस लचार ग़रीबों को कुचल कर चले जाते।।
ऐसी दया ना रखना दिल में, जिसमें होता केवल दिखावा,
दयाभाव वरदान ईश्वर का,इंसानियत का न हो इसमें सौदा।।
यह दया शब्द है तो छोटा सा, पर विस्तृत है इसकी पहचान,
सभी धर्मों को जो एक साथ लाए, है धर्म यह सबसे महान।।
