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Rajeshwar Mandal

Abstract

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Rajeshwar Mandal

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दो हजार

दो हजार

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रंग वही रुप वही

वही गांधीजी का मुखड़ा

कल तक था दो हजार

आज कागज का टुकड़ा 


किसको कहें व्यथा कथा

किसको सुनाएं दुखड़ा

जीवन सारी बीती महलों में

अंत समय में कचरा 


जीवन सार यही है राज

रंग रूप पर न बेकार पड़ो

सब मोह माया है 

पद और पैसों से न श्रृंगार धरो 


वो सुर्खियां वो सेल्फियां 

वो घमंड वो गर्मियां 

सब धरी की धरी रह गई यहां 

इस लफड़े में न बारम्बार पड़ो

जो है जैसा (सौ-पचास) भी है उनके साथ

जीवन बेझिझक बेहिचक निर्वाह करो

देख दशा दूई हजारी का

अब भी अपनत्व गैरत्व की पहचान करो।


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