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Sunil Kumar

Abstract

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Sunil Kumar

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रोटी की कीमत

रोटी की कीमत

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एक रोटी की कीमत हम क्या तुम्हें बताएं

रोटी की चाह में इंसान दर-दर ठोकरें खाये।


ये दो जून की रोटी ही घर-द्वार छुड़वाए

ये रोटी ही तो पापी पेट की आग बुझाए

एक रोटी की कीमत हम क्या तुम्हें बताएं।


ये रोटी ही तो मुरझाए चेहरों की हंसी लौटाए

गरीब हो या अमीर रोटी बिन कोई न रह पाए

एक रोटी की कीमत हम क्या तुम्हें बताएं। 


ये रोटी ही तो भूखे को आत्मसुख पहुंचाए

रोटी ही किसी को मीत किसी को दुश्मन बनाए

एक रोटी की कीमत हम क्या तुम्हें बताएं।


ये रोटी इंसान से न जाने क्या-क्या काम कराए

एक रोटी की कीमत हम क्या तुम्हें बताएं।


 



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