पिता का संघर्ष
पिता का संघर्ष
एक पिता ने क्या नहीं किया
दो वक्त की रोजी-रोटी जुटाने में
एक पिता ने चाहा
बेटे की हर ख्वाहिश पूरी हो
मेहनत की, मजदूरी की,
दो वक्त की रोटी जुटाने में
कितनी जिल्लत झेली,
कितनी पीड़ा सही
दो वक्त की रोटी जुटाने में
लौटते हुए बच्चे के मन की मिठाई लाऊं
बस, आटो का किराया बचाया
खुद ग्यारह नंबर वाली गाड़ी से घर लौट आया
थककर चूर होकर वो मिठाई का दोना लाया
केवल बच्चे को खुश देखकर
एक पिता तृप्त सा हो पाया
चाहे खुद की चप्पल घिस जाए
पर बच्चे के चेहरे में उदासी न आए
ये देखने की खातिर
मेहनत करता मजदूरी करता
दो वक्त की रोटी जुटाने में
एक पिता ने खुद न सुविधा देखी हो
पर बच्चे को हर खुशी वो देता
उसके मुस्कराने में
हर ख्वाहिश वो पूरी करता,
मेहनत करता, मजदूरी करता
दो वक्त की रोटी जुटाने में
बड़े होते ही बेटे द्वारा ये पूछा जाता
किया ही क्या आपने
उसी बात को सुन तभी
एक पिता का दिल छलनी हो जाता
जैसे उसका किया सब
धरा का धरा ही रह जाता
इतने पर भी वो कुछ बोले
एक पिता को उसका फर्ज बताता बेटा
कैसे वो अपने पिता का संघर्ष भूल जाता
पिता का दर्द क्यों नहीं जान पाता
टूटी चप्पल ,दो जोड़ी कपड़े में
रोजी रोटी कमाता
मेहनत करता, मजदूरी करता
हर दिन निकल पड़ता एक पिता
दो वक्त की रोटी जुटाने में ,
फिर भी बेटा कभी क्यों नहीं जान पाता
क्या किया एक पिता ने•••
समय का पहिया बढ़ता रहा
जब वह खुद एक बाप बना
तब ही जान पाया क्या किया एक पिता ने
दो वक्त की रोटी जुटाने में••••।
