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मिली साहा

Tragedy

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मिली साहा

Tragedy

पिंजरे में कैद पंछी

पिंजरे में कैद पंछी

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भूल चुका है वो पंछी अपनी पहचान,

जाने कब भरी थी उसने ऊंँची उड़ान,

आज़ाद हवा में उड़ने वाले पक्षियों की,

ज़िंदगी भी कहांँ होती है इतनी आसान,


कैसे जी रहा है पिंजरे में कैद  वो पंछी,

उसे भी चाहत है आसमान में उड़ने की,

घुट घुट कर जी रहा दुखड़ा किसे बताए,

कौन समझे बात इस मासूम के मन की,


आसमान छूटा उसका पिंजरा मिल गया,

किस कैद में है वो नादान समझ ना पाया,

विचलित मन,खूब फड़फड़ाया पंखों को,

आजादी के लिए लड़ा लहुलहान हो गया,


छीन लिया गया उससे आज़दी का जोश,

क्यों पिंजरा नसीब बना आखिर क्या दोष,

अपनी आज़ादी हर इंसान को प्यारी फिर,

इसे कैद देखकर भी क्यों दुनिया है बेहोश,


टूट चुके हैं पंख  उस पंछी के लड़ते-लड़ते,

थक चुका अब वो मासूम दर्द सहते- सहते,

हारकर पिंजरे को ही माना अपनी किस्मत,

उड़ना ही भूल गया ऐसी उड़ान भरते भरते,


यह पिंजरा ही उसका घर पिंजरा ही नसीब,

इंसानी फितरत का शिकार हुआ बदनसीब,

अपनी शर्तों पे जीने वाला वो आज़ाद पंछी,

आज गुलामी की बेड़ियांँ देख रहा है करीब,


वो पंछी गर एक दिन आजाद हो भी जाएगा,

पर पिंजरा उसके मन से नहीं निकल पाएगा,

शायद भूल चुका होगा आसमां में उड़ना भी,

अपनी ही दुनिया से वो अनजान बन जाएगा,


कितने वर्ष इंसानों ने इस गुलामी को झेला,

पर आज़दी की कीमत को ना समझ सका,

आज तक ना भूला पाया कोई उन कष्टों को,

तो आजादी की परिभाषा को कैसे भूल गया,


इंसानों न कैद करो पंछियों को उन्हें उड़ने दो,

आसमान छीनकर उनका उन्हें पिंजरा ना दो,

खुली हवा में ही जीवन है उनका कैद में नहीं,

बिना किसी जुर्म़ के मासूमों को सज़ा ना दो।



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