पिंजरे में कैद एक पंछी
पिंजरे में कैद एक पंछी
पिंजरे में कैद एक पंछी ,
मन ही मन सब सहती है ,
अपनी दुनिया से बिछड़कर
विरह की व्यथा में तड़प - तड़पकर वह रहती है।
साथ छूट गया साथी का
अब दिल की बात भला किसे कह वह पाती है ?
अपनी अतरंगी दुनिया का वह देख न पाती अब नज़ारा,
समय का पहिया ऐसा घूमा साथ छूट गया वह न्यारा।
न जाने कहाँ छूट गया वह तिनकों का आशियां प्यारा,
बीच भँवर में फँस गई नैया दिखता नहीं अब किनारा ।
अपनी प्रियतम से बिछड़ी विरहनी एकाकीपन में जिंदगी बिताती है ,
कैसे समझाये इस जुल्म़ी दुनिया को प्रेम ही इस दुनिया की थाती है !
घूँट- घूँट कर सूनेपन में वह जिंदगी रोज बिताती है ।
नहीं सुन पाती अब वो उन सखियों की चहचहाहट,
विलासिता हो गया अब वन का विचरण ,
दुर्लभ हो गया उन नवीन मधुर फूलों - फलों का स्वाद चखना।
अब एक पल भी सुकून की साँस कहाँ ले पाती है ?
संग बिताये गये साथी के साथ उन खुबसूरत लम्हों को
याद करके आँख उसकी भर आती है ,
पिंजरे में कैद एक पंछी
आखिर कैसे सब सहती है?
अपनी दुनिया से बिछड़कर वह विरह की अग्नि में ,
हर पहर तड़प - तड़प वह रहती है ।
इस उम्मीद में की एक दिन छूटेगी इस पिंजरे से ,
बितायेगी प्रियतम संग फिर वो सुकून की सुरमयी शाम ,
इस आश में वह अपनी जिंदगी बचाये जाती है।

