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Brijlala Rohanअन्वेषी

Romance Tragedy

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Brijlala Rohanअन्वेषी

Romance Tragedy

पिंजरे में कैद एक पंछी

पिंजरे में कैद एक पंछी

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पिंजरे में कैद एक पंछी ,

मन ही मन सब सहती है ,

अपनी दुनिया से बिछड़कर 

विरह की व्यथा में तड़प - तड़पकर वह रहती है। 

साथ छूट गया साथी का 

अब दिल की बात भला किसे कह वह पाती है ?

अपनी अतरंगी दुनिया का वह देख न पाती अब नज़ारा,

समय का पहिया ऐसा घूमा साथ छूट गया वह न्यारा।

न जाने कहाँ छूट गया वह तिनकों का आशियां प्यारा, 

बीच भँवर में फँस गई नैया दिखता नहीं अब किनारा ।

अपनी प्रियतम से बिछड़ी विरहनी एकाकीपन में जिंदगी बिताती है ,

कैसे समझाये इस जुल्म़ी दुनिया को प्रेम ही इस दुनिया की थाती है !

घूँट- घूँट कर सूनेपन में वह जिंदगी रोज बिताती है ।

नहीं सुन पाती अब वो उन सखियों की चहचहाहट, 

विलासिता हो गया अब वन का विचरण ,

दुर्लभ हो गया उन नवीन मधुर फूलों - फलों का स्वाद चखना।

अब एक पल भी सुकून की साँस कहाँ ले पाती है ? 

संग बिताये गये साथी के साथ उन खुबसूरत लम्हों को

याद करके आँख उसकी भर आती है ,

पिंजरे में कैद एक पंछी 

आखिर कैसे सब सहती है?

अपनी दुनिया से बिछड़कर वह विरह की अग्नि में ,

हर पहर तड़प - तड़प वह रहती है ।

इस उम्मीद में की एक दिन छूटेगी इस पिंजरे से ,

बितायेगी प्रियतम संग फिर वो सुकून की सुरमयी शाम ,

 इस आश में वह अपनी जिंदगी बचाये जाती है।



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