फर्क
फर्क
जिन्हें सब कुछ मिलता है
वे इसका मोल नहीं समझते,
जो इसे अनमोल समझते हैं,
उन्हें बड़ी मुश्किल से मिलता है
कई बार तो मिलता ही नहीं
लोग भूखे सो जाते हैं
और हम कचरे के डिब्बे में गिरा देते हैं
जी हाँ,
मैं उसी खाने की बात कर रहा हूँ
जिसे हम घरों में,
शादी ब्याह में,
या किसी भी आयोजन में
दिखावे के नाम पर
शान का प्रतीक समझते हुए
यूँ ही गिरा देते हैं
वही किसी भूखे के जीवन का आधार बन सकता है
आज भी इस उन्नत राष्ट्र में
हर गली में
हर चौराहे में
कचरे के हर डब्बे में
होटलों और ढाबों के बाहर
हजारों लोग, बच्चे, मर्द, औरतें
भूखे नंगे मिल जाएंगे
जिन्हें भरपेट खाना नसीब नहीं होता
और हम और हम जैसे हजारों लाखों लोग
अपनी झूठी शान की गवाही देने के लिए
जाने कितना भोजन यूँ ही गिरा देते हैं
क्या यह अन्न का अपमान नहीं
क्या यह गरीबी पर तमाचा नहीं
इतना तो हम कर ही सकते हैं कि
भोजन हम दो थालियों में ले
पहली थाली का भोजन ख़त्म हो
तभी दूसरी थाली का भोजन ले
अन्यथा किसी भूखे को सम्मान के साथ
बैठकर खिला दें।
वैसे भी रोजमर्रा कि जिन्दगी में
हर व्यक्ति जरूरत से कुछ कम खाकर
बाकी का खाना किसी गरीब लाचार भूखे को
खिला सकता है
इतना भी अगर राष्ट्र का हर समर्थ व्यक्ति
कर ले तो शायद देश को भूखा न रहना पड़े
जी हाँ
ठीक समझा आपने
मेरा देश दो पाँटों में बँटा हुआ है
समर्थ और गरीब
इस फर्क को पाटा तो नहीं जा सकता
हाँ कम जरूर कर सकते हैं
बस एक कोशिश
हाँ सबको मिल कर करनी होगी
एक सफल सच्ची कोशिश
तो आइये आज मिलकर ले एक प्रण
कि यूँ ही न गिराएंगे आज से अन्न
थाली में उतना ही लें जितना हमें खाना है
बाकी बचा भोजन किसी गरीब को खिलाना है
भुखमरी मिटाने में यह छोटा से योगदान
शायद बचा लेगा कितनों के ही प्राण
तो क्यूँ न करे आज से ही एक अच्छी शुरुआत
करें हम एक सार्थक सोच का आगाज़
बस एक प्रबल मनोबल
थोड़ी सी इच्छा शक्ति
एक दृढ़ निश्चय
एक उत्तम संकल्प
एक कोशिश
बस एक कोशिश
इससे किसी की जिन्दगी में थोड़ा भी फर्क अगर ला सकें तो
शायद वही जीवन का सबसे सुखद पल होगा
किसी के चेहरे की खुशी
कब हमारी खुशी का सबब बन जाए
जाने किसकी दुआ कब हमारे काम जाए
जाने कौन हमारी जिन्दगी का मसीहा बन जाए
तो आइये लाते हैं सब मिलकर
समाज में,
विचारों में
एक छोटा सा फर्क
बस एक छोटा सा फर्क……
एक सफल प्रयास
एक पवित्र अहसास
बस एक कदम
और हजारों खुशियों का स्पन्दन
और थोड़ा सा फर्क……।
