पारिजात
पारिजात
कितनी सुहानी भोर है,
शांति चहुं ओर है।
पारिजात से झर रहे हैं,
टप टप श्वेत फूल।
कर्णप्रिय तुमुल कर रहे हैं,
झर झर झरते फूल।
ब्रह्म मुहूर्त में ही क्यों,
झरते हैं पारिजात से फूल।
श्वेत सुकोमल, सुंदर,
मनोहर पारिजात के फूल।
कुदरत का अजब करिश्मा है,
क्या ब्रह्म मुहूर्त और,
पारिजात का कोई रिश्ता है?
कहते हैं ब्रह्म मुहूर्त में,
धरा पर विचरते हैं देव,
स्वर्ग से धरा पर उतरा है।
पारिजात का पेड़,
देवों से मिल कर रोता है।
या देवों का स्वागत करता है।
मैं इसके नीचे थाल रख देती हूं,
फूलों को झरते देखती हूं ।
रोम रोम पुलकित हो उठता है,
आस परिवेश महक उठता है।
इस आनन्द की अनुभूति,
अलौकिक है अनुपम है।
आनंद की अभिव्यक्ति ,
गिरा के लिए अगम है।
ब्रह्म मुहूर्त में
पारिजात का साथ
बड़ा आनन्द देता है
मैं इसे देख ये मुझे
देख खुश होता है
रख देती हूं कुछ फूल
घर के मंदिर में
घर महक उठता है
किसी सुबह सुनायेगा
पारिजात अपने
स्वर्ग के किस्से
मुझे इंतज़ार रहता है।।
