STORYMIRROR

Devendraa Kumar mishra

Tragedy

4  

Devendraa Kumar mishra

Tragedy

पानी और शर्म

पानी और शर्म

1 min
337

पानी और शर्म एक दूसरे के पूरक हैं 

या कहें पर्यायवाची 

इसलिए तो लोगों की शर्म मर रही हैं जैसे जैसे 

मर रहा है पानी भी वैसे वैसे 

अब यही देखिए - शर्म से पानी पानी होना 

चुल्लू भर पानी में डूब मरना 

आँखों का पानी मरना 

आदमी पानीदार नहीं रहा 

तो आदमी में शर्म नहीं 

और धरती में पानी न रहा 

बात बराबर रही 

जिन्हें पानी की चिंता है 

वे पहले पानीदार तो हों 

तब तो पानी मिलेगा 

पानी को भी खोजना पड़ रहा है 

और शर्म को भी 

दोनों गायब 

दोनों मर रहे हैं 

कहीं ऐसा न हो फैशन के नाम पर आदमी घूमने लगे नग्न 

और चुल्लू भर पानी न मिले डूब मरने के लिए 

बेशरम तो मरा हुआ ही समझो 

जीने के लिए और पानी चाहिए. 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy