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Dheeraj Srivastava

Romance Fantasy Inspirational

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Dheeraj Srivastava

Romance Fantasy Inspirational

पागल

पागल

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बीत गये है बरसों लेकिन जाने कैसा नाता है।

प्रिये आज भी उसी गली से पागल आता-जाता है।

बात पुरानी और मुहब्बत

अब भी पहले वाली है !

मगर शहर ये बिना तुम्हारे

बिल्कुल खाली खाली है !


याद दिलाकर बीती बातें वक्त इसे बहकाता है।

प्रिये आज भी उसी गली से पागल आता-जाता है।

रात-रात भर जगता है ये

बतियाता है तारों से !

तन्हाई में तुम्हें ढूँढ़ता

भाग रहा त्योहारों से !


कभी तुम्हारे खत पढ़कर ये अन्तर्मन महकाता है।

प्रिये आज भी उसी गली से पागल आता-जाता है।

दीप जलाता नहीं शाम को

दिल वैसे भी जलता है।

खुद ही खुद में डूबा है बस

खुद ही खुद को छलता है।

विरह अग्नि को अश्कों से ये बस केवल दहकाता है।

प्रिये आज भी उसी गली से पागल आता-जाता ह ।


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