STORYMIRROR

Renu Singh

Abstract Classics

4  

Renu Singh

Abstract Classics

पागल मन

पागल मन

1 min
513

क्यों हृदय में रुदन अभी है बाकी

प्रतीक्षा में कटी सुबह शाम रात्रि


नव भोर का प्रहर फिर जगा रहा आशा

आंखों से अभी भी बहती अश्रुधारा


द्वार पर टकटकी लगाए नयन ,

हर आहट पर बढ़ जाती धड़कन


कोई नहीं आने वाला समझ नहीं पाता

ये मेरा पागल मन।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract