STORYMIRROR

Renu Singh

Romance

3  

Renu Singh

Romance

मानिनी

मानिनी

1 min
404


मानिनी थी अभिमानी नहीं

द्वार खड़ी ईशत् अवगुंठित

प्रतीक्षा में थी प्रियतम की

अन्तस्थ पीड़ा विगलित हो

कमल नयनों में थी संकुलित

मन्द समीर प्रवाहित हुई

तरिणी की मधुर सुगन्ध लिये

कमलिनी थी प्रतीक्षा रत

चांदनी में खिलने के लिये

क्यों न फिर व्यथित हो कोमलाङ्गी

पिय मिलन की प्यास लिये

मानिनी है अभिमानी नहीं

दुःख से विगलित गात लिये

द्वार खड़ी ईशत् अवगुंठित

पिय मिलन की आस लिये।

   



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance