STORYMIRROR

Birendra Nishad शिवम विद्रोही

Tragedy

3  

Birendra Nishad शिवम विद्रोही

Tragedy

न्याय की उम्मीद

न्याय की उम्मीद

1 min
333

आँख के बदले आँख

सर के बदले सर

सीखा हमने ग्रंथों से

छाती हो गयी थी चौड़ी

जब देखा भीम पी रहा था खून

महाभारत में दुःशासन का।


दिमाग़ हमारा चर रहा था घास,

हम पीट रहें थे तालियाँ

जब हीरो विलेन से प्रतिशोध के लिए

इस भारत में पी रहा था खून शासन का।


कहने को तो हम लोकतंत्र के सच्चे नागरिक हैं

पर विश्वास कितना करते हैं संस्थाओं में,

पुलिस हमारे लिए दलाली का पर्याय है,

राजनीतिक पार्टियां हैं रिश्वत का अड्डा,

कोर्ट से न्याय की उम्मीद नहीं ,

संसद है मसखरी का अड्डा।


यहाँ तक कि अपने ही वोट से जिताये गए संसद विधायक की शक्ल याद नहीं,

दे आये थे वोट, एक जरुरी काम समझ कर,

वरना देखा कब था किसी का मेनिफेस्टो,

कौन क्या करेगा हमारे लिए, देश के लिए

या खुद के लिए?

फुर्सत ही नहीं कुछ सोचने की समझने की

तो अब क्यों, सुशासन की दुहाई

कानून का रोना, न्याय की उम्मीद।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy