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Dilip Kumar

Abstract


4.6  

Dilip Kumar

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नकली है शायद !

नकली है शायद !

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सबके देह की गंध अलग–अलग है

संजु की , मंजु की, रेणु की , रानी की,

गंध तो गंध है!

कभी इस गंध में, कभी उस गंध में

खो जाता हूँ, डूब जाता हूँ

ध्यानमग्न –ध्यान में सहायक है गंध ।

तुम्हारी अनुपस्थिति में भी,

तुम्हारे वस्त्रों से ही

तुम्हारी गंध का अहसास भी ।

उस रात परेशान था मैं,

जब तुम्हारा ड्राईवर तुम्हें छोड़ने आया था ।

उसके मोजे की गंध, 

गंध विशिष्ट होती है,

सबकी अलग-अलग ।

नैसर्गिक है गंध क्या ?

कृत्रिम भी है गंध

धनिया-पुदीना के देह की 

गंध बची नहीं है,

सिंहनी, हिरनी, हथिनी, अश्विनी में,

गंध मची हो शायद !

कविता गंधहीन हो गई

नकली गंध डाला है शायद।

क्या गंध मचा रखा है कवियों ने

लेखकों ने ---

नायक हो या खलनायक

आने से जाने तक

पता ही नहीं चलता

नकली है शायद ।

संवाद, कथानक, गीत सबकुछ ॥

नकली है शायद ।



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