नजर का क़त्ल
नजर का क़त्ल
उल्फ़त में यूँ दिल बेक़रार न करा कीजिये,
नज़रों से किसी का कत्ल न करा कीजिये !
ग़र जिस्मानी मुलाक़ात मुमकिन नहीं तो ,
बेवक्त ख्वाबों में ही दरयाफ्त करा कीजिये !
वक़्त से हार कर यूँ हमदम उदास न बैठिये,
वक़्त का वक़्त तक सामना करा कीजिये!
बेवजह खामोशी अच्छी लगती नहीं जनाब,
कुछ नहीं तो हमसे शिकवा ही करा कीजिये !
जब भी कोई मुकम्मल फैसला करा कीजिये,
दिल से भी जर कभी मशवरा करा कीजिये!
