STORYMIRROR

Ranjana Jaiswal

Tragedy

4  

Ranjana Jaiswal

Tragedy

निशानी

निशानी

1 min
404

प्रकृति बदल रही है 

मौसम बदल रहा है 

हवाएं बदल रही हैं रुख

गुनगुनी हवा अचानक हो जाती है तीखी 

पल में बदली 

पल में धूप 


कभी आसमान 

महीनों बना रहता है चटियल मैदान 

उसका नीलापन हल्का क्यों हो रहा है ?

खत्म हो रहे हैं जंगल 

छोटे हो रहे हैं पहाड़ 

कम होती जा रही है


नदियों की गहराई 

समुद्र की ओर नहीं 

नदियाँ अब बढ़ रही हैं हमारे घरों की तरफ

सब कुछ गड़बड़ा जा रहा है 

न गिद्ध न चीलें..

कौए भी नहीं 


खाली-खाली हो गया है आसमान 

पीपल ठूँठ हो रहे हैं 

कम हो रही है झींगुरों की झंकार

न चौपालें न हुक्के


न लोग सुनाने वाले शेख चिल्ली की गप्पें

प्रलय की निशानी है 

कहते हैं बुजुर्ग।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy