STORYMIRROR

Purushottam Das

Abstract Tragedy Others

4  

Purushottam Das

Abstract Tragedy Others

रिक्तताएं

रिक्तताएं

1 min
27

तुमसे कई मुलाकातें अकसर की राह चलते की 

टुकड़ों में ही सही बातें रोज की थी अपनी तुम्हारी 

तुम्हारे लिए बेहद सामान्य रहा होगा ये सब 

मेरे लिए भी इसके कोई खास मायने नहीं रखे थे 


रोज की ये भेंट तुमसे बिना कोई छाप छोड़ती  

यूं ही बिसर जाती आधी कही आधी सुनी बातें 

ऐसा भी नहीं हुआ कि तुम्हारा उधार हो मुझपर 

न ही मैंने तुम्हें कुछ देने की ख्वाहिश रखी कभी 


लेकिन आज जो तुम चले गए हो पहाड़ सी रिक्तताएँ देकर 

मुलाकातों का सिलसिला नहीं दोहराने का पक्का वादा निभाकर 

इन रिक्तताओं का क्या करूँ मैं इस शून्य को कैसे भरूँ मैं 

तुमसे पूरी बात कैसे कहूँ मैं तुम्हारी पूरी कैसे सुनूँ मैं 


सच कहूँ अब जब तुम नहीं हो बहुत कुछ नहीं बदला 

पर तुम्हारी कमी खली है जो स्थायी रह जाने वाली है 

रोशनी में डूबे घर का एक कोना स्याह पड़ गया है 

राह भी है, सफर भी है, कोई हमसफ़र है जो छूट चला है 



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract