निजात
निजात
वो सामने खड़ा हुआ था उस कारखाने के। वह रोज आकर उस कारखाने के दरवाजे पर दस्तक देता, यह जानते हुए भी कि उस दरवाजे पर एक ताला लगा है जो शायद अब उसके लिए कभी नही खुलेगा।
जाने कितना समय वह वहाँ बैठकर अपने जीवन के उन पलों को याद करता रहा जब उसने अपने हुनर के दम पर अपने जीवन के कितने ही साल इस जगह पर गुजारे थे।
अपने परिवार के लिए जीविका के साधन के रूप मे यह कारखाना किसी मंदिर से कम नहीं था। यह उसे अपनी ओर खींचरहा था।
भले ही नीला आसमान, पक्षियों का कलरव, खुली हवा उसकी जिंदगी को लंबी बना रहे थे लेकिन उसके स्वाभिमान को इन सब चीजों से निजात चाहिए।
