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नदीयॉ सहनशिल

नदीयॉ सहनशिल

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नदीयॉ सहनशिल पावन

होती है निर्मल मनभावन

तनमन मे त्यागभरा है

बहता भाव समर्पण।


देखती हुं मै हमेशा

नदियॉ को बहते हुये

सब बुरी गंदगी को

बहाकर ले जाते हुये।


मर्यादा सम्हांलती है इक

नारी की तरह नदीयॉ

क्यों नही बनते हम नदीयॉ

की तरह निडर हरदंम।


सुरताल मे जब बहती है

अस्तित्व संभालकर

मंजिल अपनी रप्ता-रप्ता

तय करती दमंदमं।


पहाडो से बहकर आती

इठलाती नदीयॉ

देश-विदेश से मदमाती

आती है छंमछंम।


पेड पोधो को उखाडकर

पत्थरो को फोडकर

बिनारूके पहाडोका सीनां

है भेदती संनसंन।


पग घुंगरु बांधे चली

पिया मिलन को जैसे

बुंद-बुंद प्रित सहेजकर

जब आती है यौवन।


बिकट राहसे चली नवेली

बनकरके दुल्हनियॉ

पिया सागरसे मिलन की

होती मनमें तडफंन।


कोई करे मैली कोई

पिये कोई ये पाणी

मानव ना समझे नदियॉ की

दुखभरी कहाणी।


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