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Madhu Vashishta

Tragedy

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Madhu Vashishta

Tragedy

नैतिक मूल्य।

नैतिक मूल्य।

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यह गिरते नैतिक मूल्य

समाज को कहां ले जा रहे हैं?    

भारतीय संस्कृति का पतन हो रहा है, 

लोग पाश्चात्य सभ्यता को अपना रहे हैं।

हमारे छप्पन भोग छोड़कर

केवल चॉकलेट को मीठा बता रहे हैं।

भिन्न भिन्न राज्यों की भिन्न-भिन्न वेशभूषा,

पर घर से निकल रहे हैं बनके अजूबा।

गांवों के वह घर जहां गूंजती रहती थी हर तरफ किलकारियां।

दादा दादी के कंधे पर चढ़कर बच्चे करते थे सवारिया

सूनापन वहां पर पसरने लगा है।

हर रिश्ता एक दूसरे को आंखें दिखाने लगा है।

अपनों से आंखें चुराने लगा है।

नैतिक मूल्यों का पतन क्या हुआ है।

माता पिता भी मम्मी पापा बन कर

अब तो नाम में मॉम डैड ही हुआ है।

पैसा इस जगत में महान जो हुआ है।

आज पैसों से मूल्यों का मोल भी हुआ है।

नीति अनीति की परवाह किसी को नहीं।

केवल मैं और मेरा में ही मन अब टिका है।

कंक्रीट के जंगल चहुं और उग रहे हैं।

मानवता रो रही है, सन्नाटे पसर रहे हैं।

गांव खाली हो रहे थे, अब शहर भी हो रहे हैं।

कुछ ऐसी चमक दमक में सब कोई खो रहे हैं।

विदेशों में जाकर बच्चों के जो घर बस रहे हैं।

शहरों के बड़े बड़े घरों में माता-पिता तरस रहे हैं।

प्रॉपर्टी के डीलर गिद्ध से हर घर को तक रहे हैं।

नैतिकता के मूल्य इस हद तक गिर रहे हैं।

कुछ समझ नहीं आता कि लोग यह कर क्या रहे हैं?

यह जीवन के नैतिक मूल्य इतना क्यों गिर रहे हैं।



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