STORYMIRROR

Archana Tiwary

Abstract

4  

Archana Tiwary

Abstract

नारी

नारी

1 min
699

गंतव्य की तलाश में टुकड़े टुकड़े होती रही


हर जख्म जो उसने दिया

रिसता रहा रक्त बन कभी


नारी को तुमने ये सोच कर

कुचला की ये अबला है तो

कर सकती नहीं कुछ अपने लिए


सोचा नहीं गर ठान ले तो

आगे टिक न सकता कोई


नारी मोम बन जलती है तो

सब कुछ जलाना जानती है


पीड़ा सहन करती है तबतक

आक्रोश दिल में भरता न जबतक


रिसते हुए रक्त देख कर

जख्मों की गिनती करती नहीं


तलाशती है मंज़िल अपनी

भूलभुलैया बन जो दिखती नहीं


गंतव्य की तलाश में

टुकड़े टुकड़े होती रही


ज़ख्मों को रिसते देख देख

बढ़ती रही रुकती नहीं


साहित्याला गुण द्या
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract