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सागर जी

Classics

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सागर जी

Classics

मुझे नहीं चाहिए

मुझे नहीं चाहिए

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अगर है जीवन, चालाकी, धोखेबाज़ी का नाम,

तो मुझे नही चाहिए, ऐसा जीवन कोई।

अगर है प्यार का नाम स्वार्थ, बेवफ़ाई,

तो मुझे नही चाहिए ऐसा प्रेम कोई।


मैं सीधे-सादे दिल का इंसा हूं,

अपने में ही मगन रहना चाहता हूं।

क्यों देते हैं, दख़ल, लोग मेरे कामों में,

जबकि मैं इनसे परे रहना चाहता हूं।

अगर है काम, कामचोरी, गप्पबाज़ी का नाम,

तो मुझे नही चाहिए, ऐसा काम कोई।


क्यों जलते हैं लोग मुझसे, जबकि मैं तो दीपक हूं,

रौशन करना चाहता हूं, लोगों की राह।

औरों की चाह बहुत महत्वपूर्ण हैं,

क्या ! तुच्छ और व्यर्थ है, 'सागर' की चाह !

अगर है मन, दूसरे की हंसी, दिल तोड़ने का नाम,

तो मुझे नहीं चाहिए, ऐसा मन कोई।


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