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Yogesh Kanava

Abstract Romance Classics

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Yogesh Kanava

Abstract Romance Classics

मत्स्यगंधा 2

मत्स्यगंधा 2

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प्रसन्न अति निशाथ राज आज।

घर आई एक सुकन्या आज।।

दिनों को जाते कब देर लगती है।

आद्रिका पुत्री अब यौवन सखि है।।


किन्तु कितनी विकल अपने आपमे।

कैसा जीवन दिया किस अभिशाप मे।।

यौवन भरपूर किन्तु गंध विचित्र आती।

सोच निशाथ कन्या की आँखे भर आती।।


मत्स्यगंध लिए वो मत्स्यगंधा अंगी।

उद्वेलित मन न बन पाया कोई संगी।।

कौन ले जाएगा मुझको घर अपने।

इस मत्स्यगंधा के कैसे पूरे हों सपने।।


मन ही मन कितनी हो गई थी वो निराश।

बैठी कालिंदी तट लिए नाव, न कोई पास।।

भवें कमान,तीक्ष्ण कटि,मृग सदृश्य कुलांच।

पिघले सीसा भी, ऐसी यौवन तपन आँच।।


सुडोल मांसल देह और बाँहें मेरी तप्त।

फिर भी जीवन मेरा कैसा अभिशप्त।।

क्या हो पाउँगी मुक्त, मैं इस अभिशाप से।

पूछती हर बार यही प्रश्न वो अपने आप से।।


क्या जीवन मेरा यूँ ही रहेगा अतृप्त।

कैसे होंगी अभिलाषाएँ मेरी संतृप्त।।

नयन अश्रुधार मन व्याकुल अधीर।

बैठी थी वो बस ऐसे ही यमुना तीर।।


नीरव जल बह रहा था,और था खग-वृंदगान।

कौन आया निकट उसके,नही उसको भान।।

देख सम्मुख वो देवपुरुष अपने।

भूल नैया लगी वो उसको तकने।।


बोली सेवा आर्य मैं क्या करूँ।

बैठो नाव मे नदि मैं पार करूँ।।

चमक रहा था तेज से उसका भाल।

सोचा दुर्गंध से क्या नहीं है बुरा हाल।।


सहज भाव से बोला वो ऋषि।

मैं द्वैपायन पुत्र पाराशर ऋषि।।

ले अपनी नाव, कर ऋषि सवार।

चल पड़ी वो लिए हाथ पतवार।।


तनिक दूर चलते ही बोले उससे ऋषिवर।

क्यों है भरे यौवन मे भी तेरे मुख पर पतझर।।

हाँ ऋषिवर है सच, यौवन मेरा तप्त।

किन्तु फिर भी, है कितना अभिशप्त।।


क्या चाहती हो मुक्ति इस दुर्गंध से ?

महक उठे तेरा तन दिव्य सुगंध से।।

मैने तो अब त्रासद जीवन है भोगा।

संभव यह किन्तु ऋषिवर कैसे होगा।।


क्या है कोई जतन,क्या है वो युक्ति।

कैसे मिलेगी मुझे इससे अब मुक्ति।।

मैं मुक्ति मार्ग प्रशस्त कर दूँ तो।

तेरे तन को सुगंधियों से भर दूँ तो।। 


फिर देर न करो ऋषिवर युक्ति बतलाओ।

और इस दुर्गंध से मुझको मुक्ति दिलवाओ।।

किन्तु बताओ क्या कर सकती हो मत्स्यगंधा।

महके अंग अंग तेरा,तुम बन जाओ सुगंधा।।


क्या ? मैं भी वैसा जीवन जी सकती हूँ।

तो ऋषिवर ! मैं कुछ भी कत सकती हूँ।।

सोच लो,कुछ भी कर सकती हो।

किन्तु उपाय सुन, डर सकती हो।।


नही ऋषिवर, मैं कुछ भी कर लूँगी।

किन्तु अपना जीवन तो फिर जी लूँगी।।

तो फिर अपना कौमार्य दान करना होगा।

और मुझ पर तुम्हें अभिमान करना होगा।।


किन्तु यह तो उचित न होगा ऋषिवर।

लूँगी किसी और संग कैसे मैं भाँवर।।

हो कौमार्य भंग कौन तब मुझे अपनाएगा।

कैसे बनूँगी संगिनी, कौन घर ले जाएगा।।


दे कर बलि कौमार्य की,सुरभित जीवन ?

किन्तु जिया न जाए यह अभिशप्त जीवन।।

एक तरफ अभिशप्त जीवन,वहीं सुरभित काया।

ऋषि की बातों ने तो मेरा मन है अब भरमाया।।


क्या करूँ क्या न करूँ, समझ न आए।

ऋषि की यह बात किन्तु मन न भाए।।

देख असमंजस मे ऋषिवर यूँ बोले।

त्रिकालज्ञ होगा पुत्र, मन क्यों डोले।।


तेजस्वी होगा, करेगा अभिमान युग। 

हरेगा संतान,देगा तुझको भी सुख।।

मैं देख रहा हूँ उसका प्रारब्ध।

गुणी ज्ञानी और होगा लब्ध।।


संकोच न करो यह स्वीकार करो।

आओ लगो अंग और अंगीकार करो।।

उचाट था ऋषि मन बीच मझधार।

नाव ले रही थी हिचकोले बार बार।।


इधर नाव उधर ऋषि मन लहरों मे था।

उसका यौवन अब, कहाँ पहरों मे था।।

देख उसका मौन ऋषि ने हाथ बढाया।

नैया मे ही उसको अपने पास बिठाया।।


नहीं रहा अब मेरे भावों पर कोई जोर।

हे सुन्दरी अब लौट चलो तट की ओर।।

वो भी कहाँ अब अपने वश मे थी।

थी मंत्रमुग्ध वो ऋषि के वश थी।।


चंचल नयन विशाल चहक उठे।

साँसों के सुर भी अब बहक उठे।।

किन्तु संशय फिर भी उसके मन मे था।

भले ही ज्वालामुखी उसके तन मे था।।


देख रही ऋषि को किन्तु कुछ न बोली थी।

नैया भी मझधार अब तो यूँ ही डोली थी।।

सुनो सुन्दरी है तू असमंजस तेरा जानता हूँ।

किन्तु तेरे भीतर की अग्नि को पहचानता हूँ।।


देखो न करो संकोच,तनिक निकट आ जाओ।

और अभिशप्त इस जीवन से मुक्ति पा जाओ।।

शीतल मन्द पुल्कित बह रही है बयार।

है मादकता इस यौवन पर कितनी सवार।।


यूँ व्यर्थ न यौवन को गंवाओ अपने।

ले चलो एकान्त पूरे हों सब सपने।।

देखो तनिक न तुम यूँ संकोच करो।

झांँको मेरी आँखों मे अब न यूँ डरो।।


यह सुरभित शीतल बयार मन्द मन्द।

पुष्प,पराग,लतिका,जूही और मकरंद।।

अनजाने मे ही वो ले हाथ पतवार। 

चली तट की ओर छोड़ मझधार।।


जाने ऐसा क्या जादू किया ऋषिवर।

सम्मोहित सी मै, ना सूझे कोई डगर।।

इसी उलझन सम्मोहन मे लो आ गया तट।

बस और नही आ जाओ ऋषि तुम निकट।।


उसने भी हाथ बढा दिया कुछ न बोली।

आगे आगे चले ऋषिवर, पीछे वो हो ली।।

कोमल हरित दूर्वा और सघन छाँव।

देख ऋषि के वहीं ठिठक गए पाँव।।


बोले प्रिय, यही है उत्तम स्थान।

आओ निकट मेरे, करें संधान।।

खोल वेणी फैला दिए उसने केश।

उन्मुक्त था,मादक था वह परिवेश।।


और बँध गए वो प्रणय सूत्र।

यूँ मिलन से हुआ एक पुत्र।।

पुत्र! हाँ कृष्ण वर्ण नयन विश्वास।

जग प्रणेता कृष्ण द्वैपायन वेद्व्यास।।


देख तेजस्वी पुत्र ममत्व जाग गया।

क्षणभर जगनिंदा का डर भाग गया।।

किन्तु काल की भी है अजब माया।

तब ही ऋषि उसके सन्निकट आया।।


ले पुत्र हाथ वो दूर जाने लगा।

स्नेहिल हाथ से सहलाने लगा।।

यह क्या तुम ऋषिवर, सितम ढा रहे हो।

जी भर देखा भी नही दूर ले जा रहे हो।।


मै माता इसकी यह न हो मेरे साथ।

यह तो ममत्व पर ही होगा आघात।।

सुन्दरी ये तुम्हारे जीवन का ध्येय नहीं।

यह पुत्र तुम्हारे लिए अभी गेय नही।।


अभी करने हैं तुमको संधान कई।

रही जोह बाट तेरी, एक राह नई।।

कह ऋषिवर पुत्र संग कर गए प्रस्थान।

किन्तु बैठी रही यह,छोड़ न पाई स्थान।।


यद्यपि सुरभित हो गई थी,मत्स्यगंधा।

अंग अंग सुवासित, हो गई वो सुगंधा।।

गंधकाली, गंध कस्तूरी,मादक वो योजनगंधा।

यौवन ज्यूँ बहे कालिन्दी पार्वती वो अलकनंदा।


द्वितीय सर्ग


आज वही यमुना,वही नीर,वही तीर।

वहीं बैठी थी वो, लिए हिए धीर।।

दुग्ध धार ज्यँू बह रहा था वो निर्मल नीर।

कोमल देह सुरभित,किन्तु श्याम वर्ण शरीर।।


फैली वन,उपवन मादकता मधुमास की।

सब थे,मृग,खग सब थे और थी वासवी।।

आम्रवल्लियों से महक रहा था उपवन।

इधर योजनगंधा बैठी थी लिए चितवन।।


उफनती लहरियों का, वह संगीत मधुमय।

इधर उफन रहा यौवन, वासवी युव-वयः।।

यमुना लहरें भी उछल उछल देख रही।

फेन अपना उसके तन पर फैंक रही।।


भीगी पिडंलियाँ,भीगा वक्ष यौवन सारा।

मदमस्त था यमुना क भी वह किनारा।।

देख यौवन अनावृत उसका, कोयल कूक रही।

धधकती यौवन ज्वाला मे, जैसे घी फूँक रही।।


देवलोक,इन्द्रलोक, यमलोक रहे सब यह देख।

इधर कामदेव ने भी अपने सब शष्त्र दिए फेंक।।

यक्ष,गंधर्व,किन्नर,मानव सब बेसुध हो जाएँ।

लगी होड सब मे पलभर रूप वो देख पाएँ।।


ऊषा, ज्योत्सना सा था, कितना यौवन वह स्मित।

भूल अपनी ही कस्तूरी गंध, मृग कितना विस्मित।। 

कुसमित कुंज मे पुल्कित पुष्प अलि प्रेमालिंगन।

मधुकर भी मकरंद उत्सव मे हुआ देखो संलग्न।।


डोले सुना सुनाकर, गीत वो गाए प्रेम राग के।

पहुँच गया जलने वो परवाना निकट आग के।।

मृग भी पहुँच गए देखो गंधाकर्षण मे खिंचे हुए।

मंद मंद मुस्कान लिए अधर मधुरस सिंचे हुए।।


सुरभित शीतल समीर बह रही थी मन्द मन्द।

योजन दूर भी उपस्थिति कह रही थी वह गंध।।

हाँ वही थी वह गंधवति,मत्स्यगंधा, गंधकाली।

अधरों पर लिए बैठी थी जो,मधुरस की प्याली।।


चन्दन वन मे जूही, चमेली जैसे थी वो वासवी।

किन्तु था व्याकुल मन, नहीं कोई तनिक पास भी।।

कोमल बाँहें फैला, जैसे आलिंगन जादू जगाया।

मन चितवन से व्याकुलता, आलस को भगाया।।


अब वो चंचल हिरणी सी तक रही चहुँ ओर।

जाग उठा था अब वो यौवन प्रलय घनघोर।। 

जो कस्तुरी गंध से महक रहा तन महका-महका।

निर्लज्ज हवा का झोंका भी यूँ डोले बहका-बहका।।


इधर योजनगंधा बैठी थी अनपे ही ख़यालों मे।

उधर उलझ रहा था मन शान्तनु का सवालों में।।

चहुँ ओर फैली कैसी यह मदहोशी है।

कोई नहीं है किन्तु अजब ख़ामोशी है।।


कैसा यह मायावी सा माहोल है यहाँ।

गंध मदहोश ये किसने फैलाई है यहाँ।।

सारथी खींचो लगाम तुरंग की रोको यहीं पर।

उतरा नीचे,रखे अपने पाँव राजन ने मही पर।।


बोला कैसी विचित्र है यहाँ की यह माया।

किसने कस्तुरी गंध से यह उपवन महकाया।।

अमात्यवर ! ठहरो यहीं मैं अभी आता हूँ।

खोजने यह गंधस्रोत मै अभी जाता हूँ।।


यह कैसी अनहोनी हो रही है आज।

इस गंध के पीछे कोनसा है राज।।

यह मन क्यों खिंचा जा रहा है उस ओर।

देखूँ तो सही कौनसी दिशा,कौनसा है छोर।।


मै शान्तनु नृप पराक्रमी बलशाली तो ठहरा।

किन्तु मेरी सोच पर किसका है यह पहरा।।

अनदेखी,अनजानी सी कैसी है यह डोर।

कौन खींच रहा मुझको दिश उस ओर।।


मैं विचलित इतना क्यों होता जाता हूँ।

ढूँढता हूँ तनिक,क्या खोज पाता हूँ।।

देवयोग है यह या कोई राक्षसी माया।

मेरे तन मन को यह किसने भरमाया।।


है भला अगर कोई राक्षसी माया यह।

क्या चाहता है मुझसे बोल,बात कह।।

किन्तु कोई दैवीय शक्ति का है चमत्कार।

तो फिर इसमे छुपा है कोई बडा उपकार।।


मन क्यों इतना व्याकुल हुआ जा रहा है।

कौन है जो इसको इतना भरमा रहा है।।

कोई नृप भी असहाय हो सकता है।

भला कौन यह बात कह सकता है।।


किन्तु है यह सत्य,आज निरीह हो गया हूँ।

मदहोशी कैसी है यह,जैसे यहाँ खो गया हूँ।।

कुछ तो बात ऐसी जो मति से परे है।

नियति की ताल पर कौन नृत्य करे है।।


नभ,खग,धरणी और चराचर को मैनेे देखा।

सब के सब मदमस्त,सबका बस वही लेखा।।

सब झूम रहे थे पवन हिलोर संग।

मैं भी देखकर बस रह गया था दंग।।


चलो अब चलूँ,खोज का संधान करूँ।

जिस दिश आती है सुरभि,प्रस्थान करूँ।।

खिंचा चला गया,बह रही थी वही यमुना धार।

ज्ञात न हुआ तनिक भी,आ गया योजन पार।।


यहाँ यह अश्व कैसे हिनहिनाया है।

ल्गता है अजनबी कोई यहाँ आया है।।

मंत्रमुग्ध सा एक राजपुरुष वहाँ पर खड़ा था।

राजसी परिधान,शीश मुकुट जो हीरों जड़ा था।।


देख अजनबी को हाथें से वक्ष अपना छुपाया। 

मंद मुस्काया,और नाम शांतनु अपना बताया।।

कुरुवंश का वह कुलदीपक राजमुकुट सिर पर।

फैला उजियारा,बदली हटी ज्यूँ बिखर कर।।


कौन हो देवी ? तुम किस घर जायी हो।

अप्सरी कोई,छोड़ देवलोक इधर आई हो।।

हे राजपुरुष मै। निषाथकन्या नौका चलाती हूँ।

तनिक ठहरो मैं, अपनी पतवार लिए आती हूँ।।


आज स्वर्ण मुद्राएं मिलेंगी मुझे विशेष।

भगवन आए हैं मेरे यहाँ राजपुरुष भेष।।

था शांतनु गंगा वियोग से व्याकुल।

आज देख गंधिके वो हो गया आकुल।।


एक तरफ गंगा का चेहरा था तो।

दूजी ओर गंध का अजब पहरा था।।

आज भूल गंगा को वो खो जाना चाहता था।

मन सब छोड़, गंधिके का हो जाना चाहता था।।


गंगा भी तो कहाँ साथ निभा पाई थी मेरा।

छोड़ पुत्र संग मेरे,जल मे ही किया बसेरा।।

किन्तु मैं ना अब यूँ रह पाउँगा।

पर क्या गंगा को यह कह पाउँगा ?


किन्तु जीवन यूँ तो न अब कट पाएगा।

दर्द बिछोह का कैसे अब घट पाएगा।।

देवयोग है यह कोई जो आया इस वन।

न्योछावर कर दूँ इस पर अब तन-मन।।


यही सोच शांतनु तनिक न रुक पाया।

हे गंधकाली तेरा रूप न मैं सह पाया।।

रूप,रस,गंध, यौवन की ये तो सखी है।

मेरी निगाह बस आज यहीं आ रुकी है।।


त्निक ठहरो देवी तुझे जी भर देख तो लूँ मैं।

जी करता है अब शेष जीवन यहीं जी लूँ मैं।।

सकुचाई मृगनयनी वो चली कुलांचे भरती।

देख रहा था ये गगन देख रही थी धरती।।


आई वो गजगामिनी सी लिए हाथ पतवार।

विठा राजन को नाव, ले चली मझधार।।


 तृतीय सर्ग


था वो धूमकेतु रूप के आकाश मे।

शांतनु भी बंध गया उसके रूपपाश मे।।

ऐसा था रूप लावण्य, थी वो गंध काली।

निर्बल नतमस्तक था चो बाहु बलशाली।।


भूला राजपाट वो मन मे उसका साया।

सुगंधा पर देखो राजा का मन है आया।।

निसंदेह गंधिका रूपवति थी अति।

तभी तो राजा की भी घूमी थी मति।।


उसने मन मे बस यही कुछ ठानी।

मत्स्यकन्या को बनाऊँ अब पटरानी।। 

सोच रहा था, करते वो नोका विहार।

कैसे प्रकट करूँ इस पर अपना विचार।।


राज मन किंचित यूँ बोला मन तो टटोलूँ।

किन्तु मन की बात अब कैसे इसको बोलूँ।।

यही असमंजस था राजा के मन में।

भटक गया था बियाबान रूपवन में।।


था वो नौका मे किन्तु तब ऊब रहा था।

गंध सुंदरी के विचारों मे मन डूब रहा था।। 

बीच-बीच मे नैया लहरों से हिचकोले खाती।

पैरो की पायल वो उसकी छनक छनक जाती।।


हे सुन्दरी तनिक मेरी बात ध्याान से सुनो।

सोचो,समझो, मनन करो और मन में गुणों।।

तेरे रूपपाश मे बंध गया है इस राजा का मन।

तुझे देख जल रहा है अब मेरा मन,मेरा तन।।


राज महिषि के सुख का नहीं तुझको ज्ञान।

कुरुवंश भी तुझ पर करेगा सदैव अभिमान।।

यहाँ कर रही हो तुम इस सुन्दरता से खिलवार।

छोड़ो अपनी यह नैया, छोड़ो यह अपनी पतवार।।


छेखो कितनी कठोर हो गई हैं तुम्हारी हथेलियाँ।

अब खूब ईर्ष्या करेंगी भाग्य पर,तुम्हारी सहेलियाँ।।

क्या तुम नहीं चाहती हो इठलाना भाग्य पर ?

राज करो मुझ पर और इस कुरु राज्य पर।।


देवी ! तुम हो अतुल सुन्दरी जान लो।

मेरे इस प्रेम प्रस्ताव को तुम मान लो।।

मैने कह दी अपने मन की बात तुम्हें।

व्याकुल हूँ मैं अब ले जाने को साथ तुम्हें।।


हो तुम्हें मेरा यह प्रणय निवेदन यदि स्वीकार।

बढाओ अपना हस्त करलो मुझको अंगीकार।।

नहीं राजन मैं तुच्छ सी निषाथ कन्या यहाँ।

और आप कुरुवंश का दमकता सूर्य कहाँ।।


नहीं देवी तेरे सामने नृप् अभिमान नहीं शेष।

कहो तो मैं भी अब ले लूँ मछुआरे का भेष।।

यह मेरा सौभाग्य बनूँ मैं आपकी पटरानी।

जानती हूँ अमर रहेगी मेरी यह कहानी।।


किन्तु इस निर्णय का अभी मुझको अधिकार नहीं।

न चल पाउँगी जब तक जनक को स्वीकार नहीं।।

निशाथराज से राजन को अब मिलना होगा।

मुझसे प्रेम को प्रकट उन पर करना होगा।।


तो फिर देर किस बात की न करो विलम्ब।

मोड़ो नौका का रुख तट की ओर अविलंब।।

अब न सह पाउँगा तुझसे कोई दूरी।

सामने है मन का मुराद होने को पूरी।।


इधर नृप तो सुगंधा प्रेमविह्ल था।

उधर अमात्य नृप बिन विकल था।।

ले सैनिक निकल पड़ा वो नृप तलाश में।

किन्तु पदचिन्हीें का पता न चला घास में।।


चहुँ दौड़ा दिए उसने अपने अश्वारोही।

किन्तु राजा की न ले पाया कोई टोही।।

तभी अमात्य को सहसा कुछ याद आया था।

सुरभित गंधी थी जिसने राजा को भरमाया था।।


सुनो सैनिको ! ध्यान से मेरी बात सुनो।

यह गंध आती जिस दिश,वही मार्ग चुनो।।

जने कौन मायावी है इस गंध का छोर।

नृप भरमाकर ले गई यह अपनी ओर।।


चलो कूच करो,अब न देर करो।

हो राक्षस कोई उसे वहीं ढेर करो।।

इधर सैनिक लिए चला अमात्य गंध की ओर।

उधर वासवी ले आई थी नौका तट की ओर।।


म नही मन वो विचारनक लगी थी यह बात।

कितना भावन होगा पल होउँगी मैं नृप साथ।।

किन्तु तनिक ठिठक कर बोली वो गंधा।

राजन! यह सत्य है होता है प्रेम अँधा।।


जिस दिवस यह प्रेम रेग उतर जाएगा।

मुझको कोई ठोर न फिर मिल पाएगा।।

तुम राजा प्रतापी हो इस कुरुवंश के।

और तब मैं झेलूँगी डंक विरहदंश के।।


देवी! ऐसा कोई विचार न मन मे लाओ।

मुझ पर विश्वास करो मेरे निकट आओ।।

राजपुरुषों मे तो यह रीत चली आई।

आज यह प्रिया तो कल वही पराई।।


कठिन तनिक राजपुरुष पर विश्वास करना।

ज्यूँ छितराए बादल से मेघ की आस करना।।

प्हले भी तो रानी है उस रनिवास मैं।

थे आप खोए उसके भी सुवास में।।


फिर आज यह कैसे मान लूँ मैं।

रहेंगे मुझसे बंधे पहले जान लूँ मैं।।

गंधिके मैं चाहता तो ले जाता बलात् उठाकर।

होती पताका मेरी निषाथराज का नाम मिटाकर।।


किन्तु यह उचित न होता कदाचित मेरे लिए।

तब हो न पाता प्रेम हृदय मे तेरे, मेरे लिए।।

तुम तो मिल जाती किन्तु प्रेम न मिल पाता तेरा।

इसलिए कहता हूँ स्वीकार करो यह विनय मेरा।।


बातों ही बातों मे पहुँच गए जहाँ उसका डेरा था।

निषाथराज थे और था संध्या का गहन अँधेरा था।।

झिंगुर की उस ध्वनि ने नीरवता को था तोड़ा।

निषाथराज ने पगध्वनि की ओर मुँह था मोड़ा।।


पुत्री आ रही थी अजनबी को लिए अपने साथ।

किया अभिवादन उसने जोड़ अपने दोनो हाथ।।

कटि खड़ग, कंधे पर तुणिर और धनुष है।

लगता है यह तो कोई वीर राज पुरुष है।।


आर्य आपका स्वागत है मेरी कुटिया, आइए।

कौन देश के कौन राजपुरुष हैं आप, बताइए।।

मैं बताती हूँ,हस्तिनापुर नरेश हैं अपने घर आए।

पुत्री से यह सुनकर बस निशाथराज तब घबराए।।


अहो भाग्य मेरे, मेरी कुटिया नृप पधारे।

हुआ मैं आज कृतार्थ जागे भाग्य हमारे।।

कहिए राजन् मैं क्या सेवा कर सकता हूँ।

आप कहें तो बैरी से भी लड़ सकता हूँ।।


निशाथराज मैं कुछ मांगने तुमसे आया हूँ।

किन्तु इन्कार न कर दो यही सोच घबराया हूँ।।

आदेश करें राजन हम तो सेवा मे तत्पर हैं।

मै निशाथराज और साक्षी सब जलचर हैं।।


तो फिर सुन लीजिए आप मेरे मन की बात।

चाहता हूँ वासवी को ले जाना अपने साथ।।

यमुना तट हुआ कस्तुरीगंधा से मेरा सामना।

बने हस्तिनापुर की पटरानी यही है कामना।।


हस्तिनापुर पटरानी ? और यह निशाथकन्या।

कैसे रह पाएगी महलों में यह उन्मुक्त वन्या।।

समझ लेगी, रह लेगी सब सह लेगी किन्तु।

आश्वस्त होता नहीं यह मन फिर भी किन्तु।।


निशाथराज ! शंकित ना हों आप बेटी को लेकर।

निशंक हो जांए आप,उसका हाथ मेरे हाथ मे देकर।।

वो सब ठीक है किन्तु वासवी से मैं बात करूँगा।

हो यदि उसकी भी यही इच्छा,तभी मैं हाँ भरूँगा।।


तो स्वयं पूछ लीजिए आप भीतर जाकर।

और बताइए उसकी भी मर्जी मुझको आकर।।

बहुत देर हुई भीतर पिता-पुत्री कर रहे मंत्रणा।

और बाहर नृप व्याकुलता की झेल रहा यंत्रणा।।

व्याकुलता ! कस्तुरी गंधा को पाने की।


पुरुष अभिमान और पौरुष बताने की।।

किन्तु जब निशाथराज बाहर आए।

देख चिंतित चेहरा नृप बस घबराए।।

क्या हुआ ? क्या गंधिके को इन्कार है।

क्या प्रस्ताव मेरा उसको अस्वीकार है।।


नहीं राजन नहीं, किन्तु उसके मन मे संशय है।

ज्येष्ठ पुत्र बनेगा राजा उसको कहाँ प्राश्रय है।।

तभी वासवी बोली सम्मुख नृप के आकर।

बने मेरा पुत्र राजा तब मिले संतोष जाकर।।


भांवर लूँ नृप संग तब ही मैं।

राजमुकुट निज सुत देखूँ मैं।।

बनोगी रानी देवव्रत तेरा भी पुत्र होगा।

जागेगीे तेरी ममता वह बडा सूत्र होगा।।

नहीं राजन यह तो मुझको स्वीकार नहीं।

ना हो मंजूर तो कर सकते अंगीकार नहीं।।


अमात्य भी आ पहुँचा लिए सैनिक साथ।

बैन सुन क्रोध से खींच तलवार ली हाथ।।

मेरे नृप का अपमान मैं सह नहीं सकता।

खड़ग म्यान मे लिए अब रह नहीं सकता।।

निशाथराज अब गिन लो अपनी अन्तिम घड़ियाँ।

मेरी खड़ग आतुर तोड़ने तेरे साँसों की लड़ियाँ।।

देख अमात्स को वहाँ राजन चोंक पड़े।


चारों तरफ सेना और बीच अमात्य खड़ें।।

नहीं अमात्यवर निशाथराज को कुछ न कहो।

अपने सैनिकों सहित तुम जहाँ हो वहीं रहो।।

राजन के आदेश से हिम्मत कुछ आ गई थी।

निशाथराज की जुबान किन्तु लड़खड़ा गई थी।।

राजन ्! विमाता का दंश हर स्त्री ने सहा है।

सत्यवति ने भी कहाँ कुछ ये ग़लत कहा है।।


मैं भी सहमत हूँ उससे, यह संकल्पित है।

कहो यह संशय उसका क्या कल्पित है।।

डोली धरती,सर राजा का तब चकराया।

ज्येष्ठ सुत ना बने राजा,बस जी घबराया।।

कैसे शान्तनु कर सकता था? यह स्वीकार।

नयन सम्मुख छाया था बस अब अंधकार।।

दंवव्रत युवराज न हो अन्याय न कर पाऊँगा।


गंधिके अब तेरे बिन ही यहाँ से लौट जाऊँगा।।

चलो अमात्यवर सैनिकों को ले साथ।

हमे नहीं चाहिए अब वासवी का हाथ।।

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 चतुर्थ सर्ग


छोड़ निशाथ प्रदेश हस्तिनापुर लौट आए,

किंतु मन ना लगता राजपाट में रहते भरमाए।

पकड़ ली ष्शैय्या रुग्ण हुई काया, 

सभी सन्न राजन को कैसा रोग आया।

ना औषध, ना कोई उपचार लगा, 

राजन के मन यह कैसा प्रहार लगा। 

राजन का मन अब न कहीं लगता था, 

न होउँगा स्वस्थ मन यही कहता था। 

गंधिके बिन सब जग सूना लगता, 

किंतु वो शब्दघाव अब दूना लगता।


जेष्ठ पुत्र संग अन्याय कैसे कर पाऊं, 

करूँ तो गंगा को कैसे मुंह दिखलाऊँ।

प्रश्न यही बारंबार जी में आता,

सोच सोच कर वो व्याकुल हो जाता।

साजपाट अब अमात्य भरोसे लगा चलने,

देवव्रत को भी यह बात लगी थी खलने।

सोचता वो आखिर कौन सी ऐसी बात हुई, 

कौन है व्याधि राजन को मुझको ना ज्ञात हुई।

कैसे जानू किससे पूछूं कोई नहीं बताता,


है कौनसा द्वंद जो राजन को यूँ सताता।

राजन के द्वंद की वो करने लगा पड़ताल,

छानने लगा वो पात पात डाल-डाल,

किंतु भेद वो ना जान पाया फिर भी,

आशंकाएं कितनी उसके मन फिरती।

तत्काल मन में एक विचार कोंधा, 

है कौन मुश्किल जिसको मैंने ना रौंदा।

कर दृढ़ निश्चय उठाया तुणीर और बाण, 

धनुष उठा कर प्रत्यन्चा दी उसने ताण।

देख देवव्रत को सब अमात्यगण यूँ चौंके,

है कौन अपने प्रणों को उसके आगे झौंके। 


राजन सहचर अमात्य किन्तु फिर आगे आया, 

देख देवव्रत उसको तनिक यूँ फिर मुस्कायरा।

हे युवराज व्यथा राजन की सह ना पाऊं,

बात किंतु ऐसी है जो मैं कह ना पाऊं।

अमात्यवर तुम हो राजन सहचर जानता हूं,

नहीं तुम अनजान राजन व्यथा से मानता हूं।

राजकाज में सहयोग है कर्म तुम्हारा,

राज भेद को गुप्त रखना है धर्म तुम्हारा।

किंतु इतना तो समझो हे अमात्यवर,

राजन हो दुखी तब भी ना फूटेगा स्वर।

राजभेद होता गोपनीय है यह मुझे स्वीकार, 

गोप्य को भी जाने युवराज का है अधिकार। 

क्षमा युवराज यह मैं जानता हूं,

किन्तु आसान नहीं यह मानता हूं।

राजन रहे व्यथित यह भी स्वीकार नही,ं

हूँ शपथबद्य किंतु मन पर अधिकार नहीं। 


अपनी शपथ से बंधा इतना ही कह पाऊंगा, 

अधिक कहा तो मैं जिंदा ना रह पाऊंगा।

राजन संग गया था अरण्य विहार, 

वहीं पर उनके मन हुआ था यह प्रहार। 

योजन पार से आ रही थी गंध मतवाली, 

कोयल की कूक की ओर मदमस्त आली। 

उस योजन पर क्या हुआ नहीं जानता हूं, 

मन राजन का खो गया यह मानता हूं। 

किस दिश अरण्य कितने योजन पार,

अमात्यवर बताओ करो यह उपकार।


यक्षिणी, गंधर्वी थी या थी कोई दानवी,

नहीं जानता युवराज किंतु रुप मानवी।

थी पूरब दिशा, तट था कालिंदी नीर,

अरण्य विहार को हुए थे राजन भीर।

कुछ सैनिक थे राजन थे संग मैं था,

अलौकिक सी वो गंध भ्रमित मन था।

राजन रोक हमें चले गए अरण्य पार,

ऐड लगाई थी और था तुरंग वायुवेग प्रहार, 

तीन प्रहर बीत गए ना राजन वापस आए, 

तब लिया निर्णय मैंने राजन को खोजा जाए। 

श्राा दृश्य अद्भुत एक योजन पार,

राजन नतमस्तक सामने सौंदर्य अपार।


अमात्यवर बातों को यूँ ना उलझााओ,

कौन है वो देवी बस सच बतलाओ।

तभी गगन से हुआ महर्षि स्वर प्रकट, 

सम्मुख थे महर्षि का वो तो उद्भट।

अमात्य को यूँ ना विवश करो युववराज,

उसको अभी देखना है और राजकाज।

ऋषिवर को देवव्रत का प्रणाम स्वीकार हो, 

किस विद जानूं भेद क्या युक्ति प्रकार हो। 

राजन हो दुविधा में युवराज कैसे सहे,

कौन है जग मैं जो यह भेद मुझे कहे।


गंगापुत्र तुम हो अतुल बलशाली,

कौनविपदा जो तुमने अब तक ना टाली।

पुत्र को कैसे कहे जो शांतनु मन पर भारी, 

राजन के मन को भाई है एक सुंदर नारी।

कौन माता कौन पिता कौन कुल वो जायी,

कौन सुंदरी है जो राजन के मन को यूँ भायी।

सारथी मेरा रथ अब तैयार करो,

बजाओ रणभेरी कूच करो प्रहार करो।

कौन है जो देवव्रत विजयी न कर पाए, 

मेरे बाणों से तो स्वयं काल भी घबराए। 

शांत गंगापुत्र शांत क्रोध का समय नहीं,


सत्य हैं तेरे बाणों से कोई निर्भय नहीं।

किंतु बल से तुम ना जीत पाओगे,

क्या राजन को यह सब कह पाओगे। 

ऐसे ही जीतना था तो शांतनु कम ना था, 

किंतु समझो वत्स यह मामला बड़ा गंभीर था।


अपना मन शांत करो और ध्यान से सुनो,

कौन है वह सुंदरी कौन कुल जायी सुनो। 

जो मैं तुमको बता रहा हूं राजन को भी ज्ञात नहीं, 

आर्द्रिका पुत्री है वह और अप्सरी की कोई ज़ात नहीं।

ऋषि ने श्राप दिया हुई मत्स्यभाव आर्द्रिका, 

छोड़ स्वर्ग को धरा जल सागर में रही आर्दि्रका। 


यमुना का वो निर्मल नीर बह रहा,

ब्रह्मशाप ग्रसित आद्रिका का घर रहा। 

जलराशि में ही जल क्रीड़ा निमग्न, 

आर्द्रिका स्वर्ग बिछोह की लिए अगन।

इधर था सुधनवावंशी राजमुकुट पहने, 

आखेट का शोक मन में लगा था रहने। 

जोह हो रहा था काल भी बाट इस भेंट की, 

निकला दूर राजन पीछा करता आखेट की। 


एक तरफ है वृहद अरण्य दूजी ओर बह रहा यमुना नीर

राजन को वहीं दिखी थी वो और हो गई थी जल में भीर। 

राजन तनिक ठहर करने लगा विचार, 

अद्भुत किंतु कर गई यह तो हिए प्रहार।

राजाओं का मन भी ऐसे सदैव भरमाता है,

जब भी कोई है अप्रीतम सा सौन्दर्य आता है।

छोड़ो मान मर्यादा वो मोहित हो जाते, 

रोके कौन जब वो उत्तेजित हो जाते।

किंतु राजसी भाव भी अजब निराले होते हैं,

देख जलपरी ऊपरीचर उत्तेजित हो जाते हैं।


आखेट की थकान से लगे करने कालिंदी स्नान,

वहीं पर वो मत्स्या रख गई नर उत्तेजना का मान।

आज अद्भुत कुछ यूँ घट गया था,

शापित अप्सरी को वासु गर्भ डट गया था।

ब्रह्मशाप की मत्स्या वो तो मारी थी, 

गर्भवती थी किंतु अजब लाचारी थी।

अप्सरी से मत्स्य भाव मे जो आ गई थी,

यमुना की जलराशि तो मन भा गई थी।


निशाथ निकला था कालिंदी लिए नाव, 

मन हुआ प्रसन्न देख जलचरी का भाव। 

विचार किन्तु तनिक उसके मन में आया,

इतनी विशाल है इस जलचरी की काया।

अगर मैं राजन को दे दूं यह उपहार,

वह राजन का भी मुझ पर होगा उपकार।


तनिक ना उसने फिर देर लगाई,

ले जाल कालिंदी में उसने फैलाई। 

वो जानती थी मृत्यु का अब करना होगा वरण,

किंतु मेरी संतानों का तो फिर हो जाएगा भरण।

आर्द्रिका का मन भी अब ऊब गया था,

जाल निषाद का भार से डूब गया था।

यही सोच वो स्वयं जाल मे आई थी,

मत्स्य भाव से मुक्ति की युक्ति पाई थी। 


करना था उसको तो मृत्यु का वरण,

इतिहास में होगा कथा नूतन का संचरण।

उसकी युक्ति यह तो काम आई थी,

निशाथ ने भी जाल को ख्ींच लगाई थी। 

जलचरी ने पीठ से नाव को धकेला,

ले आई किनारे लेकर एक झकोला।


निशाथ ना समझ पाया यह खेल,

खींची रस्सी और लिया जाल झेल।

त्निक कइिनाई से ही नाव मे वो ले पाया,

देख विशाल जलचरी प्रसन्न हाक गई काया।

आज दिन अति शुभ है प्रसन्न भगवन्,

पाऊँ स्वर्ण मुद्रा देकर यह उपहार राजन।

इसी विचार से लादे कांधे पर वो चल पड़ा

किन्तु अब द्वार पर था द्वारपाल जो अड़ा।

राजन को तुम यह कैसे भेंअ दे पाओगे ?

सोचो परिवार और स्वयं तुम क्या खाओगे ?

तनिक मेरी बात पर तुम यूँ विचार करो,

कुछ मुझको दो और परिवार का पेट भरो।


यह बात सुन तनिक करने लगा वो विचार,

किन्तु सामने दिख रही थी स्वर्ण मुद्रा अपार।

धीरे से बोला वो निशाथ द्वारपाल से,

क्हते सत्य हो किन्तु डर है काल से।

राजन के राज्य से ही मैने यह पाया है,

अधिकार प्रथम राजन का समझ आया है।

हे द्वारपाल ! तनिक मेरी बात को समझो,

राजन हैं पितृ, हम केवल संतान समझो।

पितृ सम्पत्ति पर प्रथम अधिकार पिता का होता,

जो यह ना माने अपने हाथ वो सब कुछ खोता।

वार्तालाप बीच ही आ गए अमात्यवर,

देख वह प्रसन्न हुए विशाल जलचर।

पूछाा अमात्य ने लाए कहाँ से यह जलचरी ?


निषाथ ने तत्काल कहा कालिन्दिी है जलभरी।

वहीं पर जाल मे मेरे यह आ गई,

सोचा कर दूँ भेंट राजन को यह सही।

यही विचार लेकर मैं आया हूँ,

राजन के लिए यह जलचरी लाया हूँ।

किन्तु कैसे पहुँचू मैं राज दरबार,

कौन ले चले सम्मुख सरकार।

बस यही व्यथा? व्यर्थ चिंतित हो रहे हो,

बस चलो मेरे साथ क्यों धीर खो रहे हो।


ले जलचरी चले निषाथ, आगे अमात्य,

पहुँचे सम्मुख राजन् भव्य लोक अभिजात्य।

भव्य दरबार था और वो बजता नोपत बाजा ,

नत्मस्तक सभी सभासद सिंहासन पर राजा।

प्रणाम कर अमात्य बोला निषाथ लाय है उपहार,

राजन् ! विशाल जलचरी को करो आप स्वीकार।

अद्भुत! यह विशाल जलचरी है,

राजन की रसोई मे हो यह सही है।

बात अमात्य की सुनकर यूँ राजन बोले,

सत्य है अमात्य किन्तु ये लोग हैं भोले।


सुनो और मेरी बात का तुम्हें ध्यान धरो 

देकर स्वर्ण मुद्राएं इसकी झोली भरो।

हाथ जोड़कर बोला निशात विनम्र भाव,

राजन ! उपहार तो है मेरा सद्भाव। 

आपका आशीर्वाद जब प्रजा पर ऐसा हो,

राजन उस राज्य में फिर संकट कैसा हो। 


मैं निषाथ, एक तुच्छ प्राणी हूँ राजन, 

आप हैं प्रजापति प्रजा- मन भावन।

किंतु फिर भी राजन को कैसे करूं इंकार,

यह तो राजन का मुझ पर होगा उपकार।

निशाथ से बोले इसी बीच अमात्यवर, 

राजन के उपकार से तेरी झोली गई भरी।


इस जलचरी को अब तनिक उठाओ,

और साफ करके रसोई में दे जाओ।

जो आज्ञा अमात्यवर मैं अभी करता हूं,

साफ कर इसे अभी राजन रसोई धरता हूं।

निशाथ ने जो पेट चीरा जलपरी का,

आश्चर्य से मुख खुला रह गया सभी का।

यह तो अद्भुत अनहोनी सी है,

जलपरी के पेट दिखी चार कोहनी है

दो मानव शिशु ले,पेट से लिया साथ 

अवाक् से थे सब और वह निषाथ। 

राजन तक यह बात पहुंँचाई,


राजन भी आ गए छोड़ ठकुराई।

आई अजब प्रभु की यह लीला है,

तरीके पेट यह सब निकला है। 

निसंतान वासव को भी मोह आ गया, 

नर शिशु उसके मन को जो भा गया।

उठाकर अपने हाथों में रानी को कहलाया, 

भगवान हुए हैं प्रसन्न जो पुत्र घर भिजवाया।

किंतु कन्या को ना राजा अपना पाए,

मत्स्यगंधा मछोदरी को कौन अपनाए ?

प्रश्न एक ही था किंतु उपाय ना कोई, 


दूर स्वर्ग में कदाचित ममता भी रोई।

कालिंदी से आई है कालिंदी को ही भेंट करो,

कहा अमात्य ने निषाथ जाओ अब न देर करो। 

ले निषाथ कन्या को चला राज भवन से,

किन्तु सम्मोहित था उसके मुख मनभावन से।

कैसे इसको छोड़ दूं यह तो मर ही जाएगी,

ले चलूँ घर निशाथिनी की भी गोद भर जाएगी।

विचार जब यह उसके मन में आया,

तनिक ना देर की उसने बस अंक लगााया।

पहुँच अपनी कुटी निशाथिनी को दिया उपहार,

निज अंक भर निशाथिनीदे रही उसको दुलार।

युववयः अति सुंदर यौवन गागर भरी भरी,

यही है युवराज वो मत्स्यगंधा मछोदरी।


अवाक् सा देवव्रत खड़ा सोच रहा था,

अद्भुत किंतु यह क्या मुझे हो रहा था।

चेतना शून्य से खड़े अमात्य और युवराज,

शून्य मे खो गए थे वो ऋशि महाराज।

चेतना लौटी तो कुछ भी नहीं याद था,

एक शून्य था और शून्य का गुबार था।

तभी देवव्रत ने मन में यह ठाना था,

पिता के लिए तो अब माता को लाना था।

कर नमन् देवव्रत गंगा माता को, 

ले सैनिक संग चला लाने विमाता को।



  पंचम सर्ग


ले सैनिकों को संग देवव्रत हुआ भीड़।

मौन थी कालिंदी और मौन थे दोनों तीर।।

सबको शायद भान था देवव्रत के आने का।

कौन दुस्साहस करता मौत से टकराने का।।

परशुराम शिष्य आज किन्तु विचलित था।

कहाँ खोजे किधर जाये मन भ्रमित था।।


तत्क्षण ही याद उसको कुछ आ गया था।

वायु प्रवाह में गंध कस्तूरी वो पा गया था।।

कस्तूरी गंध यही तो ऋषि ने बतलाया था।

पवन झोँका भी तो उस दिश ही आया था।।

चल पड़ा देवव्रत लिए काफिला उसी ओर।

पवन प्रवाह बता रहा था वो कस्तूरी छोर।।

ऐड लगायी अश्व को तुरंग दिया दौड़।

निकला युवराज काफिला दिया वो छोड़।।

एक योजन पार जब वो आ गया।


गंधश्रोत कस्तूरी का वो पा गया।।

खींची लगाम गंगापुत्र ने अश्व रोक लिया।

झाँका चंहु दिश और देख सब टोह लिया।।

है कोई गंधर्वी राक्षसी या मायावी।

और मेरे संग भी माँ गंगा धारावी।।

निशंक गंगापुत्र उस ओर बस चला।

थी वो सांवली शांत और मुख भला।।

तुम जो भी हो मायावी गंधर्वी या मानवी।

आज सम्मुख हो तुम बस इस काल की।।

मैं गंगापुत्र देवव्रत कुरु वंश का भाल हूँ।

अपना परिचय दो नहीं तो मैं पूरा काल हूँ।।

आर्यपुत्र मुझको ना यूँ शक्ति दिखलाओ।

क्या सेवा करूँ तनिक ये तो बतलाओ।।

एक हाथ वक्ष पर एक हाथ थी पतवार।

रति की सहचरी थी तप्तयौवन अश्व सवार।।


ओ निशाथ पुत्री क्या तुम ही हो वो गंधकाली।

जिसने कर दी थी आँखे महाराज की मतवाली।।

तुम किसकी बात करते हो हाँ राजन एक आया था।

कुरुवंश का ही सूर्य था शांतनु नाम अपना बताया था।।

हाँ मैं उसी कुरुवंशी शांतनु का पुत्र।

देवव्रत नाम है और हूँ मैं गंगापुत्र।।

माते ! नतमस्तक है आज यह गंगापुत्र।

कुरुवंश की खुशियों का बनो तुम सूत्र।।

अपने चरणों में मेरा नमन स्वीकार करो।

मात बनो मेरी और वंश का उद्धार करो।।

उठो वत्स ! मुझको तो किंचित भी इंकार नहीं।

किन्तु राजन को कदाचित मेरी बात स्वीकार नहीं।।


मैं जान सकूँ बात युवराज को अधिकार नहीं ?

हो पिता को संताप तो पुत्र को धिक्कार वहीँ।।

होगा तुम्हे स्वीकार कैसे राजन जिसको सह ना पाया।

भरा रहा संताप में राजन इसीलिए तुमसे ना कह पाया।।

यूँ ना पहेलियाँ अब और बुझाओ।

माते अपनी बात अब मुझे बताओ।।

जानना चाहते हो तो सुनो मेरी ये आशंका।

तेरे रहते मेरे पुत्र का बज पायेगा राजडंका।।

मेरा पुत्र बने कुरुवंश का उत्तराधिकारी।

बने युवराज ना हो कभी कोई प्रतिकारी।।


बस इतनी सी बात माते संताप छोडो।

हिये धीर धरो और कुरुवंश से नाता जोड़ो।।

ना मैं प्रतिद्वंद्वी ना मैं हूँ प्रतिकारी।

तेरा पुत्र ही बनेगा कुरु राज्याधिकारी।।

यह वचन है मेरा राज ना मांगूगा।

कुरुवंश की रक्षा में सदैव जागूँगा।।

तुम वीर हो वचन की लाज निभाओगे।

किन्तु बिना राज्य के कैसे रह पाओगे।।

चलो तुम रह भी लोगे सह भी जाओगे।

किन्तु अपने पुत्र को तुम कैसे रोक पाओगे।।


मेरा पुत्र यह कदाचित सत्य होगा।

निर्णय मुझको भी अब लेना होगा।।

तभी उठा गंगापुत्र लिया निर्णय कठोर।

डोली थी धरती डोल गया गगन चहुँ ओर।।

माते ! तेरा संशय कर देता हूँ समाप्त।

मैं जनता हूँ अब होगा यह सब पर्याप्त।।

करता हूँ आज भीष्म प्रतिज्ञा मैं।

तो जीवनभर ब्रह्मचारी रहूँगा मैं।।


कम्पित कम्पित थी धरती कम्पित क्षितिज छोर।

भीष्म यह प्रतिज्ञा कर सकता था भला कोई और।।

लिया युवराज मुकुट चरणों में कर दिया अर्पित।

माते गंगा को मैं ना कर पाउँगा कभी लज्जित।।

सदा रहूँगा सिंहासन का मैं बन प्रहरी।

भोर हो रात हो या फिर हो दोपहरी।।

ले प्रतिज्ञा देवव्रत भीष्म कहलाया।


व्याकुल मन को बस गंगा ने सहलाया।।

देख देवव्रत का त्याग कालिंदी भी रोई थी।

इधर गंधिके उसकी भीष्म प्रतिज्ञा में खोयी थी।।

हो गयी थी आश्वस्त निर्भय मन स्वराज को।

मन उसका तृप्त था देख पूरण अपने काज को।।

सुन प्रतिज्ञा सत्यवती हुयी निशंक।

किन्तु यही था कुरुवंश में प्रथम डंक।।

मेरा पुत्र होगा राजा मन में ही मुस्काई थी।

किन्तु ख़ुशी उसने बाहर ना दिखलाई थी।।

माते ! विलम्ब ना करो चलने का संधान करो।


सारथी ले माते को शीघ्र अब प्रस्थान करो।।

सारथी ने अश्वों को अब रथ में जोड़ दिया।

खींच लगाम अब रथ का मुंह मोड़ दिया।।

इधर राजा मन विचलित था वासवी प्यार को।

कैसे दूर हो ताम कैसे भगाये अन्धकार को।।

तभी द्वारपाल ने आकर राजन को बतलाया।

युवराज का दूत आपके दर्शन को है आया।।


राजन को किंचित भी ना ऐसा भान था।

गंध कस्तूरी है राह में उसको ना ज्ञान था।।

मन आशंका से उसका भर गया था।

अनहोनी से भीतर तक वो डर गया था।।

युवराज का दूत भला क्या सन्देश लाया होगा।

हो सकता है नया राज्य उपहार भिजवाया होगा।।

द्वारपाल अब तनिक ना तुम देर लगाओ।


जाओ और युवराज दूत को लेकर आओ।।

राजा के मन को विश्वास ना आया था।

दूत ने वासवी का आगमन बतलाया था।।

क्या सच में गंधिके मेरी रानी बन जाएगी।

संभव हुआ ये कैसे वो ही सब बतलायेगी।।

किन्तु शर्त उसकी जो मैंने ना मानी थी।

बने युवराज पुत्र मन में उसने ठानी थी।।

क्या वो मान गयी अपनी शर्त को छोड़।

या देवव्रत ने मन उसका दिया मोड़।।

सिंहासन छोड़ अब राजन आ गया द्वार।

भूल युवराज को वो वासवी को रहा निहार।।


तात! युवराज का प्रणाम स्वीकार करो।

माता वासवी को लाया हूँ अंगीकार करो।।

अमात्य बतलाओ यह कैसे चमत्कार हुआ।

वासवी को शांतनु कैसे यूँ स्वीकार हुआ।।

अमात्य ने भीष्म प्रतिज्ञा का विवरण बताया।

डोली थी धरती राजन को भी चक्कर आया।।


मैं जनता हूँ गंगा पुत्र बहुत समर्थ है।

युवराज ना हो किन्तु यह बहुत अनर्थ है।।

अब प्रतिज्ञाबद्ध हूँ अब ना कुछ हो पायेगा।

सिंहासन को अब नया युवराज मिल जायेगा।।

उपकृत राजन युवराज को क्या बोलता।

क्या कहे कैसे कहे कैसे वो मुँह खोलता।।

प्रतिज्ञाबद्ध देवव्रत अब भीष्म बन गया था।

त्याग से उसके पिता का भी सीना तन गया था।।


राजन को भी थी अपने पुरखों की आन।

इच्छा मृत्यु का देवव्रत को दिया वरदान।।

राजन ने राजपुरोहित को तब बुलवाया।

कस्तूरीगंधा से तब अपना ब्याह रचाया।।

अब निषाथ कन्या निषाथ कन्या कहाँ थी।

हस्तिनापुर की साम्राज्ञी अब पटरानी वहां थी।

समय का भी घूमा यह कैसा पहिया था।

युवराज नहीं अब वो रक्षासूत्र रचौया था।।


   षष्ठम् सर्ग 


मधुकर मकरंद उत्सव में वासवी करे मनोरंजन। 

कुसुमित कुंज में पुल्कित राजन हो प्रेमालिंगन।। 

राजन सुगंधा के प्रेमाकर्षण में खींचे हुए। 

ज्यंूँ पुलकित मकरंद मधुरस से सिंचे हुए।। 

उषा ज्योत्सना से कब आ जाती निशा रानी। 

यूं ही चलती रही ये प्रणय मिलन की कहानी।। 

भूल राजपाट राजन अब रानी के यौवन में खोया था। 

मदहोशी का आलम था मानो समय चक्र भी सोया था।। 

उधर राजन को किंचित चिंता नहीं थी राजदरबार की। 

हस्तिनापुर को भी चाहत राज महल में बहार की।।

बहार ! हाँ थे उत्सुक सभी,वो प्रजा और दरबारी।

आए कोई खबर बताए कोई है रानी का पग भारी।। 

प्रहर दिवस कितने यूँ ही बीत गए।

सिंचित सपनों के मानो घटी यूंँ ही रीत गए।। 


गंध काली भी थी यूँ किंचित उदास। 

बढ़ती गई वह पुत्र जन्म की संचित प्यास।। 

तभी एक दिन रानी को जो चक्कर आया। 

देख राजवैद ने इसे घड़ी उत्सव की बताया।। 

उल्हासित हो गया था संपूर्ण नगर राजमहल। 

राजन का भी चिंतित मन अब गया था बहल।। 

दिवस बीत,े बीतते गए अब माह।

राजा रानी को थी अब तो पुत्र की चाह।। 

मास नवम् अब तो आ लग आया था। 

रानी को भी पुत्र जन्म का आभास हो आया था।। 

रानी को प्रसव पीड़ा ने था जगाया। 


तत्काल दाई को जो बुलवा भिजवाया।। 

दी सांत्वना दाई ने आकर महारानी को। 

निशंक रहो होगा पुत्र ही अब तो रानी को।। 

लूंगी मैं स्वर्ण मुद्राएं और गजमोती आज। 

कुरु वंश का सूर्य होगा अब उदय आज।। 

एक घड़ी पश्चात दिया जन्म पुत्र को। 

कुरुवंश का अब बनेगा विजय सूत्र वो।। 

अति प्रसन्न थी आज रानी सत्यवती।

हो गई थी पटरानी आज पुत्रवती।। 

इधर राजन ने अपना राज दरबार लगाया था। 

द्वारपाल दौड़ती हांफती गणिका को लाया था।। 

राजन की जय हो! न्व कुलदीपक आया है। 

महारानी ने बस यह कहला भिजवाया है।।

    गणिका ! तुमने दी है आज खुशी अपार। 

लो रखो यह गजमोती का अतुल्य हार।।


अमात्य! हस्तिनापुर में मुनादी करवा दो। 

युवराज ने लिया है जन्म संदेशा भिजवा दो।। 

अब तो ऐसा उत्सव मनाओ वर्ष पर्यन्त। 

बस हो जाए सम्पूर्ण यह नगर जीवन्त।।

नामकरण का देखो उत्सव भी अब निकट आया। 

राज ऋषि ने युवराज का चित्रांगद नाम बताया।। 

चित्रांगद शिशु था मात मन मोद भरी। 

किंतु तभी ज्ञात हुआ कोख है फिर हरी।। 

इस बार भी एक और राजपुत्र धरा पर आया।

अद्भुत बालक का विचित्रवीर्य नाम धराया।। 

दोनों राजकुमार खेलते कंदूक और तीर कमान। 

वीर योद्धा बनें हो हस्तिनापुर का बड़ा नाम।। 


युद्ध पर युद्ध वो जीत पाया था।

श्रेष्ठ योद्धा वो तभी कहलाया था।।

बुद्धि थी,शौर्य था और था तेज प्रचंड।

चित्रांगद वीर किंतु था तनिक घमंड।।

इधर विचित्रवीर्य धर्मनिष्ठ बालक। 

दोनों के ही थे पिता शांतनु पालक।। 

किन्तु समय चक्र को कौन रोक पाया है। 

कब होता है वह जो सबको मन भाया ह।।ै

वृद्ध हो गया था शान्तनु क्षीण थी काया। 

विलीन हो जाता है सब अंतिम क्षण आया।। 

थी पार्थिव देह वहाँ शांतनु की अब।

शोक में डूब गए हस्तिनापुर में सब।। 


सभा मे चित्रांगद को भीष्म ने तब बुलवाया था।

ले राजपुरोहित संग सिंहासन पर बिठलाया था।। 

चित्रांगदा अब हस्तिनापुर का राजा बन गया था। 

किंतु गंधर्वों का भी अब तो भ्रकुट तन गया था।। 

गंधर्वश्रेष्ठ चित्रांगद ने हस्तिनापुर राजन को कहलाया। 

नर को गंधर्वराज का नाम किसने धारण करवाया।। 

गंधर्वों का नाम लेकर कैसे राजा हो सकता है? 

जीवित बचेगा तभी नाम अपना जब खो सकता है।। 

चित्रांगद को भी यह स्वीकार नहीं था। 

ले सेना कूच किया गंधर्व प्रतिकार वहीं था।। 

हस्तिनापुर नरेश का अहंकार बड़ा था। 

गंधर्व राज का मायावी आकार बड़ा थ।।


भिड़ गए थे कुरुक्षेत्र मे कुरुराज गंधर्वराज यूँ।

हाहाकार मचा था तीक्ष्ण बाणवर्षा मेघगर्जन ज्यूँ।। 

भीषण था संग्राम वह दोनों के थे बलशाली। 

किंतु मायावी गंधर्व राज ने गर्दन भेज डाली।। 

आहत हो चित्रांगदा गिर गया धरा पर।

किंतु अनुचित ही था वो वार सरासर।।

लौट गया था गंधर्व राज विजयी होकर।

इधर बेहाल थी माता पुत्र को रो-रो कर।। 


अल्पायु ही था विचित्रवीर्य चित्रागंद अनुज।

सत्यवति थी आज फिर से प्रसन्न सचमुच।। 

अल्पायु था किंतु धर्म प्रणव था वो। 

ऐसे में पा गया था प्राश्रय भीष्म का वो।।

युववयः हो गया था वो विचित्रवीर्य भी अब तो। 

हो विवाह उसका माता को लगी चिंता अब तो।।

माता फिर भीष्म को बुलवाया था।

अपनी चिंता को फिर जतलाया था।। 

भीष्म लगा खोजने वधु उसके लिए अब।

राजपुरोहित, सामंत आने लगे थे सब।। 


काशीराज की तीन कन्याओं का था स्वयंवर। 

भीष्म ने भी थरप दिया था विचित्र को वर।।

काशीराज किंतु करना था का भीष्म का विरोध।

किन्तु शाल्व खड़ा था बीच में बन प्रतिरोध।। 

किया भीष्म ने तब तीनों कन्याओं का अपरहण। 

किंतु अंबा ने नहीं किया विचित्रवीर्य का वरण।। 

अड़ गई थी अम्बा शाल्व से विवाह की खातिर। 

किंतु ब्रह्मचारी भीष्म कर ना सका सम्मुख हाजिर।। 


शाल्व ने भी नकार दिया था भीष्म विजित अम्बा को।

न भीष्म,न शाल्व के यहां मिल पाया ठोर अंबा को।।

वो दुखी अम्बा चल निकली थी अब वन गमन को। 

मिल गए थे ऋषि होत्रवाहन करने शोक शमन को।। 

ले सलाह ऋषि की पहुंँची वह परशुराम शरण। 

कह बताया न शल्व ना भीष्म ने किया वरण।। 

कौन ले जाए कौन अपना है? यह नहीं था प्रश्न। 

क्यों भीष्म ने किया अपहरण उसका, था यह प्रश्न।।

दुखी अंबा को देखकर जो परशुराम अड़ गया था। 

किंतु अपनी आन को भीष्म भी गुरु से लड़ गया था।। 

हो गया था विजयी किंतु भीष्म ने किया गुरु वंदन। 

क्यों ना करता ऐसा वो था वह तो वही गंगा नंदन।। 

शिष्य से यूँ हारकर परशुराम ने दिया संदेश। 


अंबा को शिव पूजन का दे दिया उपदेश।। 

छोड़ अपना सब कुछ अंबा वन को हुई भीर। 

दिखती शांत किंतु ह्रदय ज्वाला लिए अधीर।। 

अम्बा अब शिव साधना में हो गई थी लीन।

प्रतिशोध में वो भूली थी स्वयं वंश वो कुलीन।। 

ज्वाला यही जीवन उसका सार्थक कर रही थी। 

जीवित तो थी किंतु पल-पल वह बस मर रही थी।। 

घोर तपस्या का परिणाम भी सुखद आया।

जो मांगा था शिव से वही सब उसने पाया।।

जाओ अम्बा भीष्म मृत्यू का कारण तुम ही होगी। 


छोड़ो जीवन और जीवन की व्याधि जो भोगी।। 

शिव वरदान से भर गई थी अम्बा की झोली। 

उसने भी अपने जीवन गागर को थी टटोली।। 

लेना होगा नवजीवन इस जीवन का अब मोल नहीं। 

त्याग दिया उसने अग्नि समक्ष जीवन खोल वहीं।।

लिया फिर से जन्म उसने जो शिखंडिनी रूप पाया। 

किंतु अर्द्ध स्त्री का यह रूप उसको ना कभी भाया।। 


यक्ष भी जान गया था दुख देख उसकी काया।

दयालु था यक्ष उसका भी तो जी भर आया।। 

किया यक्ष ने निश्चय उसके लिंग परिवर्तन का।

सफल हुआ था लिंग विनिमय यक्ष के जतन का।।

शिखंडिनी का था वह नव शिखंडी पुरुष रूप। 

किंतु यक्ष ने लिंग विनिमय से धरा स्त्री स्वरूप।।


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