STORYMIRROR

AMAN SINHA

Abstract Drama Horror

4  

AMAN SINHA

Abstract Drama Horror

मन का डर

मन का डर

1 min
378


काँप उठता है बदन और धड़कने बढ़ जाती है

शब्द अटकते है जुबां पर साँसे भी थम जाती है

लाल हो जाती है आंखें भौह भी तन जाती है

सैकड़ो ख्याल मन को एक क्षण में घेरे जाती है


खून बेअदबी से तन में फिर बेधड़क है भागता 

नींद से आँखे भरी पर रात भर है जागता 

मन किसी भी काम में फिर कहीं लगता नहीं 

अपने हीं विचार पर ज़ोर तब चलता नहीं


गर्मियों के दिन मे भी ये जिस्म ठंडा हो जाता है

दिखता तो है ज़िंदा लेकिन जीते-जी मर जाता है 

बेखयाली बदहवासी उसपर सिहरता बदन

तन से वो जगता दिखे है सो गया है उसका मन


शब्द बाकी है मगर ये होंट हीलते ही नहीं 

भाग जा ये मन कहे पर पैर ही चलते नहीं 

है पसीना माथे पर और पेट मे है खलबली 

पीठ की भी पेशियां अब हो रही है मनचली


कोई कुछ भी बोल दे पर याद कुछ रहता नहीं

दिल में रहता है मगर दिमाग में टिकता नहीं

क्या है कहना क्या है सुनना कुछ समझ आता नहीं

एक बार डर गया जो कुछ भी कर पाता नहीं 

 

भागते है जब तलक हम तब तलक भगाता है 

अपनी कल्पना से भी भयानक दिन हमें दिखाता है 

एक ही बस हल है इसका डट कर इससे हम लड़े

सामने दीवार बनकर हो जाये हम खड़े।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract