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Sachin Gupta

Tragedy Inspirational

4  

Sachin Gupta

Tragedy Inspirational

मजबूर मॉं

मजबूर मॉं

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महसूस हो रहा है बहुत महसूस हो रहा है

की अब मैं मजबूर हो गई

आज मैं अपने ही जीवन से लाचार हो गई

अब मैं अपनों के लिए ही,

मजबूर हो गई।

                        

अरे जिसे बनाया था अपने तन से

सींचा था जिसे अपने लहू से

पकाया था जिसे अपने ममता से

पाला था जिसे कांटों से बचा फूलों में

आज वो भी बदल गया ।


जिसे पालने में अपना जीवन गुजार दिया

जिसके रोने से मैंने सारा घर जगा दिया

जिसके हंसने पर, मुसकुराने पर

मैंने सब कुछ लुटा दिया

न जाने क्यों? आज वो भी बदल गया ।

            

समय बीत गया, ऋतुएं बदल गई,

मौसम बदल गया, जमाना भी बदल गया

जाने अनजाने में, न जाने कब

मेरा जीवन बदल गया

क्योंकि आज, मेरा बेटा बदल गया ।


सुबह से शाम हो गई, शाम से रात हो गई,

रात से न जाने कब फिर कब सुबह हो गई

ओह! पता भी न लगा मुझे

कब समय गुजर गया ।

पर आज न जाने कब ,मेरा बेटा बदल गया

हां आज मेरा बेटा बदल गया ।


बचपन प्यारा याद है मुझे

बीत गया सखी सहेली में, खेल कूद में

पता भी न लग पाया की कब

खेल - खेल में मेरा बचपन गुजर गया

कब यौवन आ गया

ओर एक पिता की लाडली ,

कब किसी अजनबी की दुल्हन बन गई

पर आज मैं अपने ही घर में अनजान हो गई।

                  

अरे समय बीत गया ,लोग बदलने लगे

वक्त के साथ - साथ मां-पिता ने दुनिया छोड़ दी

भाई ने भी हाल-चाल पूछना छोड़ दिया

राखी की डोर को समय ने भूला दिया

बची-खुची भाई की दुल्हन से

मुझे गैर करार दिया

अब मैं जाऊँ कहां?


अरे जीते जी पति ने न बताया अन्न का मोल

आज बेटे ने जमाने की महँगाई

मेरे चेहरे पे लीपोड़ दी

दो वक्त की रोटी और एक मिठी सुपारी में

आज बेटे की जेब कट गई।


ओह! दुःख हो रहा है बहुत दुःख हो रहा है

घर की बेजान सामान समझ

बहु ने कोना पकड़ा दिया

                        इस बुढ़ापे में बता ए -वक्त 

                        अब मैं जाऊँ कहां?

घर की मालकिन ही आज

घर की भिखारिन हो गई

इस बुढ़ापे में ही न जाने क्यों?

आज मेरी तकदीर सो गई।

      

जिसे सिखाया था चलना ,सड़क पर ,

बताया था सम्हलना सड़क पर

उसी ने आज मुझ पर पहरा लगा दिया

हाय! मरने के इन्तजार में ,अब

जीने का मजबूर हो गई।

            

सोचा था हरिद्वार में गंगा स्नान करूँगी

बद्रीनाथ जी के दर्शन करूँगी

काशी में छोड़ दूँगी प्राण

पर आज ये क्या हो गया?

आज अपने ही घर में, अपनो के अधीन

मुझे जेल हो गई,

बस दो वक्त की रोटी को मजबूर हो गई।


रोटी का मोल जो जताया बेटे ने आज

गंगा स्नान तो कोसो दूर रह गया

बस अश्रु स्नान से ही तन -मन धो लिया।

अरे बेटे की खुशियों के आगे

आज मैं फिर मजबूर हो गई

हाँ जीने - मरने को मजबूर हो गई

हाँ मजबूर हो गई।



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