मेरी सिमटती सी दुनिया
मेरी सिमटती सी दुनिया
मेरी सिमटती सी दुनिया में,
मुझे खुद से ही शिकायत है...
क्यों मैं ऐसी हूँ,
क्यों रोक नहीं पाती मैं जाते हुए कदमों को,,
क्यों मैं ऐसी हूँ,
जो हर रिश्ते को दिल से निभाती हूँ,
पर खुद ही टूटकर रह जाती हूँ,,
क्यों मैं ऐसी हूँ,
जो हर मुस्कान के पीछे दर्द छुपाती हूँ,
पर खुद के आँसुओं का हिसाब नहीं रख पाती हूँ,,
क्यों मैं ऐसी हूँ,
जो दूसरों के लिए दुआएँ माँगती हूँ,
पर खुद के लिए हाथ तक नहीं उठाती हूँ,,
क्यों मैं ऐसी हूँ,
क्यों जरूरी नहीं किसी के लिए,
अपनों में ही क्यों अपनापन ढूढंती रहती हूँ,,
क्यों मैं ऐसी हूँ,
जो सबको सँवारने की कोशिश करती हूँ,
पर खुद की तन्हाइयों में ही खो जाती हूँ,,
