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kacha jagdish

Thriller

4  

kacha jagdish

Thriller

मेरी पंक्तियां

मेरी पंक्तियां

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ह्रदय में आये भाव को

शब्दों के जरिये कोरे कागज पर बिखरेता गया

कभी खुद की बात तो

कभी जग की बात करता गया


कुछ सराहाया गया

कुछ भुला दिया गया

अपनी कल्पना की रचना को देख

मुस्कुरा के चलता गया


न इनाम की चाह

न सम्मान की आस है

कवि तो नही मैं

शब्दों को बिखरे कर पंक्तियाँ रचने की चाहत है बस।


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