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Brijlala Rohanअन्वेषी

Classics Inspirational Children

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Brijlala Rohanअन्वेषी

Classics Inspirational Children

मेरा दोस्त

मेरा दोस्त

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वो जो मेरा साथ निभाता !

हँसी- खुशी में मज़ाक का पात्र बन जाता! 

चाहे उसे मैं कभी कितना भी कोसूँ !

मगर वो किस्मत से मिला कोहिनूर था वो ! 

मेरी मुसीबतों में खुद वो ढाल बन जाता।


वह कोई और नहीं, वही मित्र है मेरा, मेरा दोस्त !

हाँ ! वही मित्र जिसकी यादें हमसे जुड़ी हुई है ! 

बचपन की वो लुका-छिपी का खेल ! 

कभी दोस्ती ! कभी लड़ाई ! 

मेरा रूठना, उसका मनाना !


उसकी खिलखिलाहट मेरी प्यार भरी इक हल्की मुस्कान !

कभी मेरी हरफ़नमौला हार ! कभी मेरे जज्बातों की जीत ! 

हार पर चिढ़ना, उसके जीत पर भिड़ना !

चलता रहता था ये सब जीवन की रेस में ! 

उसका कभी मुरझाकर रूठना, मेरा रिझकर मनाना !      


उम्र के इस पड़ाव पे न जाने कहाँ छूट गया ये सब !      

अब वक्त ही हमेशा के लिए रूठ गया मुझसे ! 

बीती हुई बचपन की सब बातें अब रह- रहकर याद आती है ! 

मेरी जरूरतों को समझना,


मेरी हर बात को दिल से परखना !

हर बार गलतियों पर गौर करना !

मेरी रूचि का भान !

और खुशियों का दुनिया जहान !


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