मौन की भाषा
मौन की भाषा
लब हिलाए बिना भी बात हुई,
मौन ही अब हमारी ज़ात हुई।
शब्द सब ख़ामोश हो गए सारे,
नज़रों-नज़रों में बात-चीत हुई।
तुमने देखा जो एक बार हँस कर,
दिल में अरमानों की बरसात हुई।
शोर दुनिया का बह गया सारा,
सन्नाटों में ही नई शुरुआत हुई।
इश्क़ कहते हैं उसे दुनिया वाले,
आँखों ही आँखों में सौग़ात हुई।
अनकहे लफ़्ज़ बन गए तराने,
जब तेरी इनायत मुझ पर हुई।
सुनके ख़ामोशियाँ तेरी 'मुरली',
ज़िंदगी से फिर मुलाक़ात हुई।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

