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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Classics Inspirational

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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Classics Inspirational

धरती की पुकार

धरती की पुकार

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इंसान को धरतीने अब आवाज़ दी है आज,
नफ़रत को कायम मिटाना कह रही है आज।

नदियाँ तरस रही है, वन भी बहाते है आंसु,
प्रकृति ने फिर दर्द की उड़ान भरी है आज।

मिट्टी की हर महक में बसी है धरती की दुआँ,
उसने हमें वफ़ा की प्रार्थना कर दी है आज।

अगर काटोगे पेड़ तो कहीं छाँव नहीं मिलेगी,
मौसम ने सोचने की हमें आवाज़ दी है आज।

साँसों का सिलसिला भी रुक जाएगा कभी,
हवाओं ने ख़ामोशी धारण कर ली है आज।

आओ बचाएँ सब मिलके ये धरती की रौनकें,
कल ने हमें उम्मीद का ख्वाब दिया है आज।

'मुरली' हमारी ज़िंदगी है धरती की अमानत,
 धरती ने प्यार की ही पुकार लगाई है आज।

 रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)


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