जय पराजय
जय पराजय
जीत का नशा भी कभी उतर जाता है,
हार का ज़ख्म भी कभी सँवर जाना है।
पराजय से कभी भी मायूस बनना नहीं,
कभी न कभी तो विजय मिलना ही है।
राह पर भले ही अनेक अवरोध आ जाए,
फिर भी मंज़िल तरफ आगे बढना ही है।
आज हार के कारण टूटकर बैठना नहीं,
कल जीतकर तुम्हें इतिहास बनाना है।
जय के नशे में कभी ख़ुद को भुलाना नहीं,
जीवन में समय कभी भी बदल जाता है।
बहुत कुछ सिखने मिलता है हमे हार से,
कठीन परिश्रम को दुनिया ने सराहा है।
जय और पराजय तो जीवन के दो पैये हैं,
'मुरली' हर हाल में उसका ख्याल रखना है।
रचना:- धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)
