हरकारा
हरकारा
मेरी नज़र में बन के आया इश्क का हरकारा,
मेरे दिल को धड़का गया चाहत का हरकारा।
समिर ने फूल से जब दिल का चुपके से पुछा,
महक ने फैलकर दे दिया प्यार का हरकारा।
सफ़र में धूप बहुत थी, फिर भी यक़ीन रहा,
उम्मीद बन के साथ चला छाँव का हरकारा।
वो प्रेमपत्र आंसु बहाकर पहुँच गया उन तक,
बना दिल में दर्द की हर पुकार का हरकारा।
अल्फाज़ रुक गये मगर आँख बोलती ही रही,
नज़र ने किया इश्क के इकरार का हरकारा।
'मुरली' लिखता हूंँ मै ग़ज़ल उसके इश्क के लिए,
मेरे रोम रोम छा गया है उसके इश्क का हरकारा।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

