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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Inspirational Thriller

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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Inspirational Thriller

मोह का बंधन

मोह का बंधन

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मोह के बंधन में हर मोड़ पर भरमाता रहा,
सत्य का सूरज मेरे भ्रम को चमकाता रहा।

लाभ-हानि की डगर में आज में खो गया हूंँ,
जीवन में लालच के लिए मै दौड़ता ही रहा।

आसक्ति की जंजीर को कभी न छोड़ पाया,
आज खुद को मै खुद में हरपल खोजता रहा।

मतलबी स्वार्थ के मेले में आज फंँस गया हूंँ,
त्याग के उज़ाले को मै हर जगह ढुंढता रहा।

मोह के बंधन में कभी मुकम्मल जहाँ न मिला,
मानवता का पथ मुझसे सदा दूर भागता रहा।

'मुरली' अब तोड़ना चाहता हूंँ मै मोह-ज़ाल को,
खुदा की कयामत का सदा इंतज़ार करता रहा।

रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात) ८ 


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