दिल का हाल
दिल का हाल
किसे सुनाएँ दिल का हाल, कोई अपना नहीं मिला,
हर एक चेहरे में मगर, सच्चा आईना भी नहीं मिला।
जिसे साथ चलने को कहा, उसने राह ही बदल दिया,
सफ़र तो कट गया मगर, कोई हमसफ़र नहीं मिला।
हज़ार बार मुस्कुराकर हमने अपने दर्द को छुपाया,
मगर हमको आँखों से प्यार का इशारा नहीं मिला।
वफ़ा की रौशनी पाने के लिए हम उम्र भर भटकते रहे,
ज़लते चराग़ तो बहुत मिले, पर उजाला नहीं मिला।
जो ख़्वाब दिल से हमने देखा, बिखर गए हवा के संग,
जिंदगी में कभी हमारे नसीब का दरवाज़ा ही न खुला।
दिल में जिसकी तस्वीर थी, वही हमसे बेवफ़ा बन गया,
मोहब्बतों के शहर में अपना खुद का पता नहीं मिला।
"मुरली" हमारी ज़िंदगी में रहा इम्तिहानों का सिलसिला,
किसे सुनाएँ हम दिल का हाल, कोई अपना नहीं मिला।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

