बरसे बदरिया
बरसे बदरिया
सावन के झूलों में बरसे बदरिया,
धरा महके, अंबर गावे कजरिया।
अंबवाँ की डाली पर कोयल बोले,
सोलाह शिंगार सज आई सजनिया।
रिमझिम बूँदों के संग पायल झनके,
दामिनी जैसी चमक रही है नज़रिया।
पपिहाँ पिया-पिया पुकारे आँगन में,
सररर पवन ने लहराई है चुनरिया।
मन के मंदिर में प्रेम की घंटी बाजे,
बढ रही है मेरे दिल की धड़कनिया।
रोम रोम मेरे तन के छूम छननन नाचे,
धीरे धीरे भरकर आई कोमल डगरिया,
"मुरली" को प्रेम से आई मिलन करने,
मैने आलिंगन दिया, शरमाई बदरिया।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

