अवगाह
अवगाह
डूबकर ख़ुद में किया जब इश्क़ की अवगाह,
खुल गई दिल पर कई अनकही-सी अवगाह।
ज़िंदगी के इस दर्द ने इतना तराशा है मुझे,
हो गई अश्कों की भी एक नई सी अवगाह।
सिर्फ़ लहरों से नहीं मिलता समंदर का पता,
गहराई माँगती है हर सच्चाइ का अवगाह।
रूह तक उतरी तो एहसास ने जाना ये राज़,
सिर्फ़ देखना नहीं होता, जीना है अवगाह।
हर दुआ, हर बंदगी जब दिल से होकर गुज़री,
नूर में ढलती गई है अब रूह की हर अवगाह।
'मुरली', ख़ुद को जो पाया तो यही सच निकला,
ख़ुद की पहचान ही है इश्क़ की पहली अवगाह।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

