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Sonam Kewat

Tragedy Classics Fantasy

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Sonam Kewat

Tragedy Classics Fantasy

मैंने सबको बदलते देखा है

मैंने सबको बदलते देखा है

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सुबह को शाम और 

शाम को रात में ढलते देखा है,

मैं वक्त वक्त पर वक्त बदलते देखा है।

मैंने सबको रंग बदलते देखा है।


मैंने कभी जीवन के रंग बदलें 

तो कभी लोगों को बदलते देखा है।

अपनों में गैरों को और गैरों में अपनों को देखा है।

मैंने सबको रंग बदलते देखा है।


सुख में नाचने वाले आंगन देखें,

दुख में बदलते हुए मातम देखें,

दोनों हालातो में लोगों को संभालते देखा है।

मैंने सबको बदलते देखा है।


कभी खुद में खुदा को देखा, 

कभी खुदा में भी खुद को देखा है।

मैंने सब बदलते देखा है,

मैंने सबको बदलते देखा है।


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