मैं भी चाहती हूं
मैं भी चाहती हूं
आंखों में आंसू बहुत है,
मैं सुखाना चाहती हूं।
माथे पर भार बहुत है,
मैं उतारना चाहती हूं।
हाथों में बेड़ियां हैं,
मैं तोड़ना चाहती हूं।
पैरों में जंजीरे हैं,
उससे मैं निकलना चाहती हूं।
दिल में यादें बहुत हैं,
मैं भूलना चाहती हूं।
लफ्जों में खामोशी है,
मैं मुस्कुराना चाहती हूं।
दिल में दर्द बहुत है,
मैं छिपाना चाहती हूं।
इंसान हो गए मौसम की तरह,
मैं भी बदलना चाहती हूं।
