मायूस मुर्गा
मायूस मुर्गा
मुर्गा मायूस हो कर सोच रहा था इक दिन,
क्यों कटती है, आखिर हमारी ही गर्दन।
क्यों बेरहमी से नोच लिया जाता है, मेरा
कोमल तन,
क्यों याद नहीं आता आखिर मेरा भी था बचपन।
ऐसा कौन सा कर दिया मैंने पूर्व जन्म में अपराध,
जिसके कारण मिलती है
सजा यह दिन और रात।
पंख के ऊपर पंख चड़ा कर मुझे डाट से पकड़
के लाता है,
बड़े आराम से मेरे सामने ही छूरी तेज दिखाता है,
न जाने कब चल जाये, छूरी, टोका यही मुझे याद आता है।
आखिर सोच यही उसके मन में आई, जिस किसी
ने दी इंसान को जागृत होने की दुहाई, आखिर
इक दिन उसने अपनी गर्दन कटाई।
मैंने भी सुबह जल्दी उठा कर इंसान को यही गल्ती की है,
शायद इसी बात की इतनी बड़ी सजा मिली है।
कब का सोया मानव था जागृत करना मेरी मजबूरी थी,
नहीं पता था मेरा ईनाम सिर्फ टोका या छूरी थी।
सदियों से हो रहा है कत्ल
ये पीढ़ी दर पीढ़ी,
न जाने कब जान बचेगी
सुनता नहीं कोई फरियाद मेरी।
छोड़ दी अब तो आबाज लगाना, जब से आलार्म
घड़ी मोबाइल में आया, न जाने क्या बदला हम से
अब तक हो रहा सफाया।
सुन दर्द भरी फरियाद मुर्गे की सुदर्शन बहुत घबराया, हीरा जन्म ले
कर मानव कैसा स्वाद लगाया, अपने तन की
खातिर क्यों करता है चन्द जीवों का सफाया।
न जाने किस दिन भगवान तक फरियाद मुर्गे की जाये, यही पूछेगा
हीरा जन्म दिया था भले के लिए, तूने मिट्टी में क्यों दिया मिलाये।

