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Karuna Gudheniya ( kukku ❤️😊)

Abstract Children

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Karuna Gudheniya ( kukku ❤️😊)

Abstract Children

मां ❤️😊

मां ❤️😊

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जितना तुमको सोचती हूं,

मैं उतनी ही उलझ जाती हूं,

मां तुम एक पहेली हो,

मैं तुमको कहां समझ पाती हूं।


बचपन में मेरी तोतली बोली भी,

जाने कैसे तुम समझ जाती थी,

मेरी आंखों से ही मेरे,

हर दर्द को पहचान जाती थी।


उंगली पकड़ मुझे हर,

बार चलना सिखाती थी,

जो गिर जाती मैं चलतें चलते,

हर बार तुम मुझे संभालती थी।


करूं कोई जिद मैं कभी,

मुझे प्यार से तुम समझाती थी,

जिंदगी को कैसे जीते हैं,

ये मेरी जिंदगी मुझे समझाती थी।


मांगू जो एक रोटी कभी मैं,

तुम मुझे दो ज्यादा ही दे जाती थी,

रूठूं जो खाने से कभी मैं,

तुम मुझे डांट प्यार से खिलाती थी,


कभी ना भूखा सोने देती,

जिद में अपनी भी बात मनवाती थी

मेरी जिंदगी ही मुझे,

जिंदगी जीना सिखाती थी।


किताब का वो पहला अक्षर,

तुम मुझको पढ़ाती थी,

जो करती मैं गलती कभी,

तुम मुझे डांट कर समझाती थी,


मेरे सपनों की मंजिल पर,

तुम कदम से कदम मिलाती थी।

हर जाती जो मैं कभी,

तेरी हर बातें मुझे होंसला दे जाती थी,


दुनिया के सारे लाड प्यार में,

मां मुझे तेरी प्यारी गोद ही भाती थी,

जिंदगी को कैसे जीना,

मेरी जिंदगी मुझे समझाती थी।


हर रिश्ते को प्यार से निभाना,

ये सीख भी तुम सिखाती हो,

परिवार को एक डोर में बांधे रखना,

ये बार बार याद दिलाती हो,


कैसे सब कुछ तुम इतने,

सब्र से सह जाती हो,

मां तुम धीरे धीरे ही,

मुझे अपना अंश बनाती हो,

जिंदगी जीने का हर नुस्खा,

मां तुम मुझे हर पल समझाती हो।


मैं तुम्हारी परछाई बन,

मां तुम मेरी आत्मा बन जाती हो,

जितना तुमको सोचती हूं,

मैं उतनी ही उलझ जाती हूं,

मां तुम एक पहेली हो,

मैं तुमको कहां समझ पाती हूं।


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