लहर हूँ मैं सागर है मनमीत मेरा
लहर हूँ मैं सागर है मनमीत मेरा
लहर हूँ मैं सागर है मनमीत मेरा,
राग जो मैं हूँ ये संगीत मेरा,
सागर बिना मैं कुछ भी नहीं हूँ,
सागर जहां है मैं भी वहीं हूँ।
सागर बिना ना आधार मेरा,
सागर की हस्ती में ही प्यार मेरा,
सागर भी मैं हूँ मैं ही लहर हूँ,
ढूंढोगे कैसे हर ओर मैं हूँ।
बनती बिगड़ती हूँ आगोश में मैं,
खो जाती हूँ इसमें ही मदहोश सी मैं,
दूर मुझ को क्या कोई इससे करेगा,
सागर है जब तक ये नाता रहेगा।
वीणा है सागर मैं कल कल का स्वर हूँ,
बंसी है सागर मैं कृष्णा अधर हूँ,
जितना करोगे तुम दूर हमको,
उतना मिलेगा सागर लहर को।
समायी हूँ सागर की बाहों में ऐसे,
चाँद में सिमटी है चांदनी जैसे,
सागर जहां है मैं भी वहां हूँ,
सागर नहीं तो मैं भी कहाँ हूँ।
प्रीत क्या होगी जो प्रीतम ना होगा,
सरगम बिना क्या संगीत होगा,
ऐसा ही रिश्ता है सागर का मेरा,
लहर हूँ मैं सागर है मनमीत मेरा।।

